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माया और ममता के बीच फंसा पीएम पद की दावेदारी का पेंच!

By टीम पर्दाफाश 
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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव आने से पहले ही सियासी पार्टियों ने कमर कस ली है। उत्तर प्रदेश में महागठबंधन के एलान के बाद अब सबसे बड़ा मंथन प्रधानमंत्री पद के दावेदार के लिए किया जा रहा है। एक तरफ कांग्रेस को महागठबंधन से किनारे कर दिया गया है। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस ने यूपी में अकेले लड़ने का मन बनाते हुए प्रियंका गांधी वाड्रा को मैदान में उतार दिया है। प्रियंका को पूर्वी यूपी की ज़िम्मेदारी दी गयी है। अब बात आती है महागठबंधन के प्रधानमंत्री चेहरे की। गैर एनडीए दलों में इस समय दो नाम गंभीरता से चर्चा में हैं, जिसमें पहला नाम यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती हैं और दूसरा नाम पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का है। दोनों अपनी दावेदारी भी मजबूती से पेश कर रही हैं।

हाल ही में ममता बनर्जी ने कोलकाता की रैली में भीड़ और विपक्ष के नेताओं को जुटाकर अपनी दावेदारी को पुख्ता बनाने की कोशिश की। अब ऐसी ही जुटान यूपी में मायावती की तरफ से भी संभावित है। यूपी में एसपी के साथ गठबंधन होने के बाद बिहार में आरजेडी के साथ भी उनके रिश्ते काफी खुशगवार बन चुके हैं। कहा जा रहा है कि जेल में बंद लालू प्रसाद यादव बिहार में पार्टी के राजनीतिक समीकरण दुरुस्त करने के लिए चाहते हैं कि मायावती बिहार से चुनाव लड़ें।

अब सवाल उठता है कि मायावती और ममता बनर्जी में से किसका पलड़ा ज्यादा भारी है? देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो मायावती का नाम सामने आता है। माया को ममता के मुकाबले क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करने में आसानी होगी। दरअसल, क्षेत्रीय दल मायावती का साथ देकर अपने राज्य में दलित वोट हासिल करने की उम्मीद रख सकते हैं। ममता का समर्थन करने पर उन्हें यह सियासी फायदा शायद ही हो।

वहीं अब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव केंद्र की राजनीति में स्थान बनवाने में मायावती की मदद इसलिए करेंगे, क्योंकि बदले में यूपी मिलने की संभावना है। दोनों दलों के बीच एक अघोषित फॉर्म्युले पर सहमति की चर्चा है। कहा जा रहा है कि अखिलेश मायावती को पीएम के रूप में और मायावती अखिलेश को सीएम के रूप में स्वीकार करेंगी।

ममता बनर्जी का अन्य राज्यों में कोई वोटबैंक नहीं है, जबकि मायावती इस वक्त देश की सबसे बड़ी दलित नेता हैं। उनकी अपील का असर देश के दूसरे राज्यों तक है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह उस दलित समाज की नुमाइंदगी करती हैं, जिसका देश की आबादी में लगभग चौथाई हिस्सा है।

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