लखनऊ। सेकुलर महागठबंधन के लिए सबसे बुरी खबर यूपी से आ रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने 27 अगस्त को पटना में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में होने वाली भाजपा हटाओ रैली में शामिल नहीं होंगी। इसके पीछे की वजह भी बेहद दिलचस्प है। बताया जा रहा है कि मायावती ने फैसला किया है कि बसपा 2017 में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में पूरे दमखम के साथ उतरेंगी। जिसके लिए उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों को हिदायत भी दे दी है।

पार्टी सूत्रों की माने तो मायावती ने गुजरात की सभी 182 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी की है। मायावती ने गुजरात इकाई के प्रभारी रामअचल राजभर को अक्टूबर से गुजरात में सक्रियता बढ़ाने और पार्टी कैडर को तैयार करने के निर्देश दे दिए हैं।

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अगर मायावती गुजरात से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने का मन बना रहीं है तो यह कोई आश्चर्य करने वाली बात नहीं है। अगर एक साल पीछे जाकर देखा जाए तो मायावती राज्यसभा में ऊना में हुई दलितों की पिटाई के मामले को लेकर जमकर हमलावर हुईं थीं। ऊना की घटना को लेकर मायावती ने देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार की छवि दलित विरोधी बताई थी।

ऊना में हुई घटना पर सियासत कर रहीं मायावती के खिलाफ यूपी भाजपा के नेता दयाशंकर सिंह ने विवादित बयान देकर यूपी समेंत पूरे देश की राजनीति को गरम कर दिया था। जिसके बाद बीजेपी को बैकफुट पर आना पड़ा था।

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गुजरात के दलितों के सम्मान के नाम पर मायावती ने जो लड़ाई लड़ी वह यूपी के विधानसभा चुनावों में भले ही उनके और पार्टी के किसी काम न आई हो लेकिन वह अब इस मुद्दे को लेकर गुजरात जाने के लिए तैयार नजर आ रहीं हैं। बसपा अपने अब तक के राजनीतिक सफर में गुजरात में सफल नहीं हो पाई है। इस ​इतिहास को देखते हुए मायावती का यह फैसला बेहद आधारहीन नजर आ रहा है। लोकसभा में शून्य और यूपी में अपने मजबूत आधार के बावजूद विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी के रूप में मौजूद बसपा के लिए गुजरात से अगर एक भी अच्छी खबर आती है तो मायावती के लिए यह एक उपलब्धि हो सकती है।

यह ठीक वैसा ही होगा जैसे 2014 के लोकसभा चुनावों में गुजरात से यूपी आए नरेन्द्र मोदी ने मायावती की पार्टी को शून्य कर दिया। अब मायावती उन्हीं नरेन्द्र मोदी को उनकी ही जमीन पर खड़े होकर ललकारने जा रहीं हैं।

गुजरात से मायावती को हासिल क्या होगा—

सियासी जानकारों की माने तो मायावती एक कठोर राजनेता हैं। वह अपनी गलती को सही साबित करने की कोशिश करतीं आईं है। मायावती ने झुकना नहीं सीखा है, शायद उनकी वर्तमान राजनीतिक असफलता का कारण भी उनकी यही अकड़ है। मायावती ने जिस तरह से किसी पर आंख बदं कर विश्वास कर लेतीं हैं ठीक दूसरे पहलू पर वह विश्वास टूटने के बाद विश्वासपात्र की छवि को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़तीं।

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जिसका ताजा उदाहरण नसीमुद्दीन हैं। वही नसीमुद्दीन जो 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं मायावती की सरकार में 19 विभागों के कर्ताधर्ता हुआ करते थे। 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के बाद जब मायावती को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने नसीमुद्दीन को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाई।

अब मायावती एक नया प्रयोग गुजरात में करने जा रहीं हैं। इस फैसले का अंजाम क्या होगा यह मायावती और उनके नीति निर्माता भी जानते होंगे। हो सकता है मायावती अपनी 2014 से शुरू हुई उल्टी गिनती को 2017 में गुजरात से बढता देखना चाहतीं हैं। उन्होंने गुजरात को इसलिए भी चुना होगा ​क्योंकि पीएम मोदी के लिए गुजरात की हर सीट अहमियत रखती है और वहां मायावती एक भी सीट जीतने में कामयाब रहीं तो वह उसे नरेन्द्र मोदी पर अपनी पहली जीत के रूप में पेशकर 2019 की लड़ाई में कूदेंगी।