ठेके पर भारत में घुसाए जा रहे रोहिंग्या मुसलमान

नई दिल्ली। म्यांमार के आंतरिक हालात को देखते हुए किसी भी समुदाय और मानवाधिकार की वकालत करने वाले संगठन को रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सहानुभूति होना लाजमी है। लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, जहां भावनाओं का सामना वास्तविकत तथ्यों से होता है। कुछ ऐसे ही तथ्य है जो भारत में ठिकाना बना चुके करीब 60 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने की वकालत करने वालों के दावों पर भारी रहे हैं।

भारत में घुसपैठ कर पहुंचे रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति संवेदना और मानवतापूर्ण वर्ताव के लिए हो रहीं बहसों में कई ऐसे सवाल हैं जिन्हें अब तक छुआ नहीं गया है। ये सवाल इतने गंभीर हैं, जो रोहिंग्या मुसलमानों को संदेह की नजर से देखने को मजबूर कर देते हैं।

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अगर हम रोहिंग्या मुसलमानों के भारत आने से लेकर उनकी अवैध आवासी कालोनियों के बसाये जाने के तरीकों पर नजर डालें तो इन सब के पीछे एक सोची समझी साजिश सी नजर आती है। जो​ आज मानवता के चोला ओढ़ कर भारत में दबे पांव घुसपैठ कर रही है।

सवाल उठता है कि जिन रोहिंग्या मुसलमानों को भूखा नंगा शरणार्थी कहा जा रहा है, वे भारत म्यांमार सीमा से जम्मू तक कैसे पहुंच गए। कैसे बांग्लादेश से होते हुए भारत पहुंचने वाले रोहिंग्या मुसलमान हरियाणा, राजस्थान और हैदराबाद तक पहुंच गए। जो लोग ठीक से हिंदी नहीं समझते। जिनके पास अपने परिवार का पेट भरने के लिए पैसा तक नहीं है। वे रोहिंग्या परिवार भारत में घुसपैठ करने के बाद जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के कई शहरों तक पहुंच गए हैं। आखिर इन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में सहूलियतें कौन दे रहा है। ऐसे कौन से लोग हैं जो भारत में इन लोगों को बसने की जगहों के बारे में बता रहे हैं। वे कौन लोग हैं जो सरकारी जमीनों पर इन लोगों की अवैध कालोनियां बसा रहे हैं। इन्हें बिजली पानी दे रहे हैं। इन्हें मोबाइल और मोबाइल सिम दिलाने में मदद कर रहे हैं।

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आखिर वे कौन लोग हैं जिनका नेटवर्क म्यांमार, बांग्लदेश से लेकर भारत तक फैला हुआ है। जिनकी मदद से इन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में घुसने के रास्ते, पहुंचने के बाद भारत के किस हिस्से में उन्हें भेजा जाना है, वहां पहुंचा कर उन्हें कहां बसाया जाएगा, और उनसे क्या काम लिया जाएगा ये सब कौन लोग तय कर रहे हैं?

म्यांमार सरकार भी बौद्ध और रोंहिग्याओं के बीच छिड़ी हिंसा को रोंहिग्या आतंकियों द्वारा पैदा की गई समस्या के रूप में देख रही है। ऐसे तमाम साक्ष्य सामने आ चुके हैं जिनमें रोहिंग्या मुसलमानों और तमाम आतंकी संगठनों के बीच गठजोड़ की बात स्पष्ट हो चुकी है। यही वजह रही कि बांग्लादेश ने भी अपने ही मूल के निर्वासित कहलाने वाले रोंहिग्याओं की वतन वापसी को आंतकी खतरे के चलते रोक दिया। जिन रोहिंग्याओं को उनका अपना मुल्क आतंकवाद के खतरे के चलते स्वीकार नहीं कर रहा उन्हें भारत में बसाने की मुहीम छेड़ी जा चुकी है।

मानवता सिर्फ एक पक्षीय नहीं हो सकती —

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जिन रोहिंग्या मुसलमानों को मानवता के आधार पर भारत में बसाने की मांग उठी है। उसके विरोध का अधार भी मानवता ही है। वह मानवता जो मिनट आतंकवाद के खतरे से डरी है। जिसे अपनी सुरक्षा के लिए कोई खतरा बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। मुट्ठी भर मानवाधिकार के झंडावरदार बुद्धजीवी लोग आतंकवादी सोच से संक्रमित एक समाज को मानवता के नाम पर भारत पर थोपने की वकालत कर रहा है। इसके लिए ऐसे ऐसे तर्क दिए जा रहे हैं, जिनकी सुनवाई भारत जैसे विकासशील और आतंकवाद से त्रस्त देश के लिए किसी लिहाज से वाजिब महसूस नहीं होती। क्योंकि यह देश पिछले 70 सालों से आतंकवाद को हर रोज महसूस करता आ रहा है।

सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शरणार्थियों के रूप में रोहिंग्या मुसलमानों का भारत आना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, भारत ऐसे शरणार्थियों के प्रति अपने अतंरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार है। यहां सवाल ऐसे शरणार्थियों का है जिनकी पहचान सिर्फ रोहिंग्या घुसपैठियों के रूप में की गई है। बिना किसी कागजी प्रक्रिया के तहत भारत में घुसे ऐसे रोहिंग्या मुसलमान भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।