दिल्ली को बनाया गया ‘मिनी कोलकाता’

नई दिल्ली: आज पूरे देश में माँ दुर्गा का यह पवित्र पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। लेकिन बंगालियों में इस त्योहार को लेकर एक अलग ही उमंग और उत्साह देखने को मिलता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी दुर्गा पूजा की धूम मची हुई है। यहाँ के सीआर पार्क, चितरंजन पार्क में बंगालियों ने माँ दुर्गा कि पूजा के लिए भव्य पूजन पंडाल को तैयार किया है। जिसे दिल्ली का ‘मिनी कोलकाता’ बोला जाता है। हालांकि ऐसा कहने पर बहुत लोगों ने आपत्ति जताई है।

देश कि राजधानी दिल्ली के सीआर पार्क के पास रहने वाले बंगालियों के लिए कोलकाता पहुंच पाना मुमकिन नहीं हो पाता, जिसकी वजह से वे कोलकाता में होने वाली दुर्गा पूजा को बहुत याद करते हैं। इसी को देखते हुए यहां के निवासियों ने दुर्गा पूजा का आयोजन करना शुरू कर दिया। ताकि वे अपने सीआर पार्क को ‘मिनी कोलकाता’ बना सकें।





सीआर पार्क में कब से शुरू हुई दुर्गा पूजा

सीआर पार्क में 38 साल से दुर्गा पूजा मनाई जाती है। बिल्कुल बंगाल के उसी तौर-तरीके और रंग में मां देवी का आयोजन यहा किया जाता है। जब भारत में विभाजन हुआ उस वक्त सिविल सर्वेंट्स खुद को पूर्वी बंगाल और पश्चिम बंगाल में बंटा हुआ सा महसूस करने लगे। ईस्ट बंगाल पाकिस्तान में चला गया और पश्चिम बंगाल भारत का ही हिस्सा रहा। सिविल सर्वेंट्स ने भारत की राजधानी दिल्ली में अपनी जगह की मांग करनी शुरू कर दी। कुछ लोग पाकिस्तान चले गए और वहां अपना घर बसा लिया और जो लोग यहां रह गए उन लोगों ने दिल्ली में ही अपनी जगह बना ली। साल 1960 के बाद इन्हें जगह दी गई और इनमें से 2 हजार लोगों को पहले जमीन मिली और बाद में ये गिनती बढ़ती चली गई। इन सबके बीच कई बंगाली ऐसे थे जो बंगाल नहीं गए। बल्कि नई दिल्ली में ही रह गए।

शुरुआती दिनों में सीआर पार्क के आस-पास कुछ नहीं था, लेकिन धीरे धीरे वहां लोग बस्ते गए। पहले वहां शिव का एक छोटा सा मंदिर बनाया गया, उसके बाद लोगों की सहूलियत के हिसाब से चीजें बनती गई। उसी शिवलिंग पर काली मां का मंदिर बना। 1970 के बाद से काली मां के उस मंदिर में दुर्गा पूजा शुरू कर दी गई और सीआर पार्क बंगालियों का हब बन गया। सीआर पार्क की दुर्गा पूजा इतनी रंगीन होती है कि बंगाली तो क्या हर कोई खुद ही यहां खींचा चला आता है। देश-विदेश से भी लोग पूजा का लुत्फ उठाने यहां आते हैं। जो पहले यहां रहते थे और अब दूसरे शहरों में बस गए हैं, वे भी पूरे साल में एक बार दुर्गा पूजा पर यहां आते हैं। हर साल अलग-अलग थीम पर पूजा पंडाल बनाया जाता है। यहां आकर लगता है जैसे लोग अलग नहीं है, वे एक दूसरे का परिवार हैं और सब एक महीने पहले से ही तैयारियां शुरू कर देते हैं।

पूजा कमिटी के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि वैसे तो काफी सालों से एक ही तरह की परंपरा चली आ रही है, लेकिन अब नई जेनेरेशन आ गई है, तो चीजें थोड़ी बदली हैं। कोऑपरेटिव ग्राउंड दूर्गा पूजा पंडाल के एक मेंबर जो बाहर चले गए थे, वे पूजा के समय वापस आ जाते हैं। कुछ भी हो जाए मैं पूरे साल में पूजा के समय यहां जरूर वापस आता हूं और यहां घर जैसा एहसास होता है। दुर्गा पूजा में बंगाल का फैशन देखने को बनता है। नए फैशन की साड़ियां, वहां का खान-पान इस दौरान लाजवाब होता है। यहां भी आपको उसकी एक झलक दिख ही जाती है। दुर्गा पूजा का सेलिब्रेशन साड़ियों के बगैर पूरा नहीं होता है। दिल्ली की महिलाएं और लड़कियां भी बंगाली लुक पाने के लिए जी जान लगा देती हैं। पार्लर, बुटिक, शॉप्स इनकी सेल भी बहुत बढ़ जाती है।



पूजा की शॉपिंग के लिए वह यहां जरूर आते हैं। इसके लिए महिलाएं खास तौर से तांत, ढकाई और तसर की साड़ियों की शॉपिंग करती हैं। इनकी डिमांड काफी रहती है। वह कहते हैं कि दुर्गा पूजा की शॉपिंग 60 से 70 प्रतिशत रेवेन्यू जेनरेट कर देती है। बंगाली कम्युनिटी के लोग धोती और साड़ी पहनना पसंद करते हैं। बंगाल का वही टेस्टी खाना, माछेर झोल, केले के पत्ते में परोसना, पुष्पांजलि, मां की आराधना, ढाक ढोल-धुनूची और मां का प्रसाद ये सब आपको मिनी कोलकाता में कोलकाता की य़ाद दिला देगा। दुर्गा पूजा बंगालियों के बगैर अधूरी है।

अभिलाष गुप्ता की रिपोर्ट