यहां सिक्कों में बसती हैं अतृप्त आत्माएं

वाराणसी: जो कहीं नहीं होता और जो कहीं नहीं दिखता, वह काशी में होता है। चाहे वह कर्मकाण्ड हो या फिर रीति-रिवाज। सभी अद्भुत और अचरज से भरा। ऐसा ही एक विधान पिशाच मोचन कुण्ड पर भी होता है। यहां सिक्कों और कीलों में अतृप्त आत्माओं का बसेरा है। पिशाच मोचन कुण्ड का पीपल का पेड़ इस मान्यता का साक्षी है। इस पेड़ के मोटे तने से लेकर शाखाओं में सिक्कों और कीलों का ढेर है। पेड़ में ठोके-गए असंख्य सिक्के और कील किसी न किसी अतृप्त आत्माओं का ठिकाना है। इसके अलावा मृत व्यक्ति की तस्वीर या अन्य चिह्नों को भी पेड़ में ठोंका जाता है। इसमें सद् और दुष्ट आत्माएं भी है तो भूत-प्रेत और पिशाच भी है।




यदि बात आध्यात्म की करे तो ब्रम्हांड में 64 लाख योनियो का वर्णन है जिसमे जीव अपने कर्म के अनुसार जन्म लेते है और क्रम फल के बाद अगले योनि में प्रवेश करते है, ऐसी ही एक योनि का वर्णन शास्त्रों में है जिसे प्रेत योनि कहा जाता है , इस योनि में वो जीव समाहित होते है जो अपने पिछले जन्म में अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाते या फिर असमय काल के गाल में समा जाते हैंयोनि आइये प्रेतों की आत्मा की शांति से जुडी इस स्थान को बताते है जहाँ प्रेतों को प्रेत योनि से छुटकारा मिलता है|

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शिव की नगरी काशी में सभी का वास है ,आखिर भोले भंडारी की प्रिय नगर में सभी तो होंगे ही, शहर के पश्चिमी उतरी छोर पर पिचाश मोचन कुण्ड स्थित है वही पास में एक अद्भुत वृक्ष है, वृक्ष के तना से जड़ तक हर जगह ताम्बे या दुसरे धातु से सिक्के के साथ लोहे का कील लगा दिखेगा| असल में ये कील किसी न किसी प्रेत आत्मा से जुड़ा है| मान्यताओ की माने तो तांत्रिक और वैदिक कर्मो के बाद भी कुछ आत्माओ को मुक्ति नहीं मिलता वो आत्मा किसी न किसी को अनेक प्रकार से परेशान करते है ऐसी आत्माओ को यहाँ न केवल शांति मिलता है वल्कि उन्हें सदा सदा के लिए प्रेत योनी से मुक्ति भी मिल जाती है|

पेड़ में सिक्के या कील गाड़ने का विधान बारह मास होता है, लेकिन पितृ पक्ष के 15 दिन खास हैं। यह पक्ष पितृलोक में रहने वाले पितरों और प्रेतयोनि में भटकती आत्माओं का मुक्ति द्वार माना गया है। गया में पितरों का श्राद्ध होता है, लेकिन पिशाच मोचन में पितरों के अलावा अकाल मृत्य, घात-प्रतिघात से मरने वाले ज्ञात-अज्ञात आत्माओं के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध होता है। इस पक्ष में किया गया श्राद्ध अतृप्त आत्माओं को मोक्ष दिलाता है। गांव-देहात से पहुंचते हैं लोग : कुण्ड में भूत उतरवाने गांव देहात और विभिन्न प्रांतों से लोग पहुंचते हैं। जो लोग पितृ दोष, भूत-प्रेत और दुष्ट आत्माओं से त्रस्त रहते हैं वो यहां एक-दो रुपये या पुराने सिक्के को पूजते हैं और उसमें भूत-प्रेत या अतृप्त आत्मा को यहां बैठा देते हैं। बैठाने का विधान पेड़ में ठेाक देना है। सिक्के के अलावा छोटी-बड़ी कीलों में भी आत्माओं को ठोका जाता है।




सिक्के या कील ठोकने के पीछे यह मान्यता है कि पुरखों का कोई ऋण अगर शेष रह गया हो या किसी पर पितृ ऋण का साया हो या फिर किसी पर भूत सवार हो तो वह इस विधान द्वारा उसे पेड़ में स्थापित कर देता है। कुण्ड के पास स्थापित ब्रम्ह देवता का मंदिर है और उनकी पूजा के साथ उन ब्रम्हा की भी पूजा होती है जो पेड़ में सिक्के या कील में बसते हैं। किसी के पुरखे ऋण आदि लेकर गोलोकवासी हो जाते हैं तो उनके संतति अपने पुरखों के उस ऋण को या खुद पर चढ़े पितृ दोष के ऋण से मुक्ति पाने के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध करते हैं। इसके साथ ही सिक्के आदि को पेड़ पर ठोक कर उनकी आत्माओं को हमेशा के लिए यहां बैठाते हैं। ब्रम्ह हत्या से भी यहां मुक्ति मिलती है। पितृ दोष या ब्रम्ह हत्या दोष पाने वाला व्यक्ति पुत्र सुख से वंचित रहता है और सफेद दाग या तरह-तरह की शारीरिक व मानसिक तकलीफ झेलता है। सिक्के या कील ठोकना एक विधान मात्र है।