मुकुल रॉय भाजपा में शामिल, ममता के खिलाफ भगवा राजनीति को देंगे धार

मुकुल रॉय भाजपा में शामिल, ममता के खिलाफ भगवा राजनीति को देंगे धार

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व सांसद और मुख्यमंत्री के करीबी रहे मुकुल रॉय ने शुक्रवार को औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यालय में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की मौजूदगी में उन्हें पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवाई। भाजपा में शामिल होने के बाद बयान देते हुए रॉय ने कहा कि टीएमसी में सिद्धांतों की कमी के चलते ही उन्हें पार्टी को छोड़ना पड़ा। पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक चुकी है। कांग्रेस की जिस विचारधारा के विरोध में जिस पार्टी की नींव रखी गई आज वही पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर राजनीति करना चाह रही है।

उन्होंने कहा कि आज टीएमसी द्वारा भाजपा पर सांप्रदायिकता की राजनीति करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। वास्तविकता यह है कि 2001 में टीएमसी ने भाजपा से हाथ मिलाया था, आज टीएमसी को लग रहा है कि कांग्रेस के बिना देश का विकास नहीं हो सकता। कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस यह कैसा सिद्धांत है। भाजपा सांप्रदायिक पार्टी नहीं है, उन्हें उम्मीद है भाजपा जल्द ही पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होगी।

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मुकुल रॉय की पहचान पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ टीएमसी के मजबूत जनाधार वाले नेता के रूप में होती रही है। ममता बनर्जी के बाद मुकुल रॉय को ही पार्टी का नंबर दो नेता माना जाता रहा है। कहा जाता है कि मुकुल रॉय की मदद से ही ममता बनर्जी ने कांग्रेस में रहते हुए टीएमसी की स्थापना की थी। मुकुल रॉय को टीएमसी को बार्ड और ग्राम पंचायत स्तर तक पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है।

मुकुल रॉय क्यों ​छोड़नी पड़ी टीएमसी —

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मुकुल रॉय को भाजपा समर्थक नेता के रूप में देखा जाता है। 2001 में ममता बनर्जी के टीएमसी में शामिल होने के बाद मुकुल रॉय ने ही राजग में शामिल होने का फैसला लेकर चुनाव में उतरने का फैसला लिया था। जिसका फायदा भी टीएमसी को मिला। कहा जाता है कि टीएमसी का 2009 में यूपीए पार्ट 2 में कांग्रेस से हाथ मिलाना रॉय को रास नहीं आया था। यही वजह रही जब यूपीए सरकार के मंत्रिमंडल में पद लेने की बारी आई तो दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाया गया। हालांकि त्रिवेदी से नाराजगी के बाद रातों रात मुकुल रॉय को मंत्री बनाया गया था।

जानकारों की माने तो मुकुल रॉय और ममता बनर्जी के बीच टकराव की वजह शारदा चिट फंट घोटाला बना। इस घोटाले में टीएमसी के कई नेताओं के नाम सामने आने के बाद मुकुल रॉय को भी सीबीआई ने रिमांड पर लिया था। बताया जाता है कि मुकुल रॉय ने अपने साथ हुई पूछताछ में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक का नाम लेकर सीधे तौर पर ममता से दुश्मनी ले ली थी।

ममता से बढ़ती दूरियों के बीच मुकुल रॉय ने पार्टी में रहते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के विरोध को मुद्दा बनाया। पार्टी के भीतर मुकुल ने एक ऐसा गुट खड़ा कर दिया जो ममता के हिन्दुत्व विरोधी
फैसलों पर सवाल उठाने लगे। दूसरी ओर टीएमसी के मुस्लिम तुष्टीकरण का मुद्दा उठाकर तेजी से उभरी भाजपा ने ममता के खिलाफ पनप रहे गुस्से को अपने पक्ष में करने में एक हद तक कामयाबी हासिल कर ली।

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भाजपा के बढ़ते जनाधार को देखते हुए मुकुल रॉय ने भाजपा और आरएसएस में अपने पुराने संबन्धों को परखते हुए टीएमसी से किनारा करने का फैसला कर लिया। उन्होंने पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं की आस्था के मुख्य पर्व दुर्गापूजा से ठीक पहले पार्टी से छोड़ने का एलान कर जनता को ममता के विरोध में एक संदेश देने की कोशिश की।

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