सपा के निकाय चुनाव प्रचार से ‘नेता जी’ गायब

सपा की निकाय चुनाव प्रचार से 'नेता जी' गायब

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के भीतर सबकुछ शांत नजर आ रहा है, पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने तख्तापलट करने वाले अपने बेटे अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वीकार कर लिया है। बेटे आशीर्वाद दिया है और छोटे भाई शिवपाल यादव को पार्टी के साथ जुड़कर चलने की नसीहत भी। जब सबकुछ ठीक हो गया, तो आखिर ऐसा क्या बचा कि पार्टी अपने ही संस्थापक और वर्तमान संरक्षक की तस्वीर तक का प्रयोग अपनी निकाय चुनाव प्रचार सामग्री पर करने से कतरा रही है।

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हम बात कर रहे हैं राजधानी लखनऊ में नगर निकाय चुनाव में मेयर पद के लिए प्रत्याशी बनाई गईं मीरा वर्धन के प्रचार के लिए प्रयोग में लाई जा रही प्रचार सामग्री के बारे में। दरअसल पार्टी की ओर से डिजायन किए 4 पेज के पैम्पलेट्स पर केवल अखिलेश यादव और पार्टी का सिंबल नजर आ रहा है, जबकि आखिरी पेज पर उनकी पत्नी और कन्नौज से सांसद डिंपल यादव के साथ मेयर पद की प्रत्याशी मीरा वर्धन का फोटो। लेकिन इस पैम्पलेट के किसी भी कोने में पार्टी के सबसे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव की छोटी सी तस्वीर नजर नहीं आ रही है।

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देखा जाए तो अखिलेश यादव निकाय चुनाव को लेकर बेहद आशावान हैं। उन्हें लग रहा है कि सपा विधानसभा चुनाव में हारने के बाद निकाय चुनाव में बेहतर परिणाम देकर 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए एक मजबूत संदेश देने में कामयाब रहेगी। लेकिन जिस तरह से अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव की अहमियत को नरजरंदाज कर रहे है उससे नहीं लगता कि वे अपनी पुरानी गलतियों से कुछ सीखे हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अखिलेश यादव ने युवाओं के बीच अपनी मजबूत छवि गढ़ी है और युवाओं के बीच उनका चेहरा बेहद लोकप्रीय है। इस बीच यहां पर एक लेकिन भी सिर उठाता है जो पार्टी के संघर्ष करने वालों के साथ अन्याय पर जवाब मांगता है। यही लेकिन उन अनुभवी समाजवादी नेताओं के जहन में उठता है, जिन्होंने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश की सबसे ताकतवर राजनीतिक पार्टी के रूप में पहचान दिलाई।

जो लोग अखिलेश यादव के ईमानदार नेतृत्व को स्वीकार करते हैं वे दबी जुबान उनके द्वारा पार्टी पर कब्जा करने के लिए मुलायम सिंह यादव के साथ किए गए धोखे को नजरंदाज नहीं कर पाते। शायद सपा को दोबारा मजबूत करने के लिए अखिलेश यादव को अपने पिता को उनका खोया सम्मान दिलाना होगा। वही सम्मान जो विधानसभा चुनावों से पहले के पारिवारिक विवाद की भेंट चढ़ने के बाद से अपनी वापसी की बांट जोह रहा है।

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