गंगा सफाई में अफसर कर रहे खेल, ‘नमामि गंगे’ हुई फेल, जहरीली होती जा रही ‘मोक्षदायिनी’

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गंगा सफाई में अफसर कर रहे खेल, 'नमामि गंगे' हुई फेल, प्रयागराज में भी जहरीली हुई 'मोक्षदायिनी'

प्रयागराज। गंगा नदी को स्वच्छ बनाने की योजना में अफसर सिर्फ खेल कर रहे हैं। अब तक नदी की बजाय ‘कागजों’ में गंगा की सफाई हुई है। जिसके कारण नदी के पास जिलों के ज्यादार गांवों और शहरों का गंदा पानी गंगा नदी में गिर रहा है। गंगा का अस्तित्व बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं चलाईं हैं लेकिन कोई योजना जमीन पर नहीं दिख रही है। इसलिए नमामि गंगे के जरिए गंगा को साफ करने के लिए केंद्र सरकार ने काफी प्रयास किया लेकिन वह भी कागजों में सिमटकर रह गयी।

Namami Gange Scheme Failed :

नमामि गंगे के नाम पर आने वाले अरबों रुपयों का भी अधिकारी मनमाने तरीके से खर्च कर रहे हैं। देशभर के ​कई हिस्सो में मौजूद गंगा नदी अपनी दुर्दशा को विस्तार से बयां कर रही है। कानपुर से लेकर प्रयागराज तक गंगा सफाई के नाम पर अफसर खेल कर रहे हैं। प्रयागराज में 82 नाले हैं और इनमें से 42 ही टैप हो सके हैं। यह तब हुआ है जब 2019 में लक्ष्य प्राप्त न कर सकी नमामि गंगे परियोजना को 2020 तक बढ़ाया गया है।

वहीं, बिना टैप किए गए इन 40 नालों का जहर भी सालभर में मात्र दो माह ही शोधित हो रहा है। जबकि दस महीने प्रतिदिन इनका 13.8 करोड़ लीटर अपशिष्ट गंगा और यमुना में गिर रहा है। राजापुर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की औसत क्षमता 50 एमएलडी (5 करोड़ लीटर प्रतिदिन) है, लेकिन यहां रोजना 80 एमएलडी नाले का पानी आता है, जो शोधित करके गंगा में छोड़ा जाता है।

इसी एसटीपी के बगल से राजापुर का नाला बहता है, जिससे ढाई लाख लीटर प्रतिदिन गंदा पानी सीधे नदी में जाता है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ प्रयागराज का हाल है। देश के विभिन्न हिस्सों में बहने वाली गंगा नदी में नालों का गंदा पानी जा रहा है लेकिन जिम्मेदार इसको रोकने में पूरी तरह से असफल हैं। कानपुर और उन्नाव में तो गंगा नदी का और भी बुरा हाल है। हालांकि, पीएम मोदी के दौरे को लेकर वहां पर नमामि गंगे को धार दी जाने लगी है।

प्रयागराज। गंगा नदी को स्वच्छ बनाने की योजना में अफसर सिर्फ खेल कर रहे हैं। अब तक नदी की बजाय 'कागजों' में गंगा की सफाई हुई है। जिसके कारण नदी के पास जिलों के ज्यादार गांवों और शहरों का गंदा पानी गंगा नदी में गिर रहा है। गंगा का अस्तित्व बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं चलाईं हैं लेकिन कोई योजना जमीन पर नहीं दिख रही है। इसलिए नमामि गंगे के जरिए गंगा को साफ करने के लिए केंद्र सरकार ने काफी प्रयास किया लेकिन वह भी कागजों में सिमटकर रह गयी। नमामि गंगे के नाम पर आने वाले अरबों रुपयों का भी अधिकारी मनमाने तरीके से खर्च कर रहे हैं। देशभर के ​कई हिस्सो में मौजूद गंगा नदी अपनी दुर्दशा को विस्तार से बयां कर रही है। कानपुर से लेकर प्रयागराज तक गंगा सफाई के नाम पर अफसर खेल कर रहे हैं। प्रयागराज में 82 नाले हैं और इनमें से 42 ही टैप हो सके हैं। यह तब हुआ है जब 2019 में लक्ष्य प्राप्त न कर सकी नमामि गंगे परियोजना को 2020 तक बढ़ाया गया है। वहीं, बिना टैप किए गए इन 40 नालों का जहर भी सालभर में मात्र दो माह ही शोधित हो रहा है। जबकि दस महीने प्रतिदिन इनका 13.8 करोड़ लीटर अपशिष्ट गंगा और यमुना में गिर रहा है। राजापुर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की औसत क्षमता 50 एमएलडी (5 करोड़ लीटर प्रतिदिन) है, लेकिन यहां रोजना 80 एमएलडी नाले का पानी आता है, जो शोधित करके गंगा में छोड़ा जाता है। इसी एसटीपी के बगल से राजापुर का नाला बहता है, जिससे ढाई लाख लीटर प्रतिदिन गंदा पानी सीधे नदी में जाता है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ प्रयागराज का हाल है। देश के विभिन्न हिस्सों में बहने वाली गंगा नदी में नालों का गंदा पानी जा रहा है लेकिन जिम्मेदार इसको रोकने में पूरी तरह से असफल हैं। कानपुर और उन्नाव में तो गंगा नदी का और भी बुरा हाल है। हालांकि, पीएम मोदी के दौरे को लेकर वहां पर नमामि गंगे को धार दी जाने लगी है।