नासा के वैज्ञानिकों ने किया दावा, इस कारण चांद पर पाई गई H2O की मात्रा

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नासा के वैज्ञानिकों ने किया दावा, इस कारण चांद पर पाई गई H2O की मात्रा

नई दिल्ली। दुनिया का सबसे बड़ा स्पेस सेंटर नासा की एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि चंद्रमा पर उल्का बौछारों के दौरान पानी निकलता है। भविष्य के लिए यह स्टडी काफी कारगर साबित हो सकती है क्योंकि पानी की मौजूदगी होने से चंद्रमा पर जीवन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

Nasa Scientists Claim The Amount Of H2o Found On The Moon :

दरअसल, उल्का से बारिश की ये ऐतिहासिक खोज ‘लुनार एट्मसफियर एंड डस्ट इनवायरमेंट एक्सप्लोरर’ (एलएडीईई) ने की है जो नासा का अभियान है। एलएडीईई नासा का रोबोटिक मिशन है जिसने चंद्रमा की सतह पर जीवन की संभावनाएं तलाशने के लिए अक्टूबर 2013 से अप्रैल 2014 तक चंद्रमा की ऑरबिट का चक्कर लगाया। इसमें पता चला है कि चंद्रमा पर उल्का बौछार के दौरान पानी डिस्चार्ज होता है।

वहीं, कैलिफोर्निया स्थित सिलिकॉन वैली में नासा के एम्स रिसर्च सेंटर में एलएडीईई प्रोजेक्ट चल रहा है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े एक वैज्ञानिक रिचार्ड एल्फिक ने कहा, ‘चंद्रमा पर ज्यादातर वक्त H2O (पानी) और OH की मात्रा नहीं पाई जाती लेकिन चंद्रमा से उल्का पिंड गुजरने पर भाप का पता चला है। उल्का पिंड के गुजरते ही H2O और OH अपने आप समाप्त हो जाता है। ‘ नासा की एक प्रेस रिलीज में यह बात कही गई है। चंद्रमा पर पानी और भाप से जुड़ी यह स्टडी ‘नेचर जियोसाइंस’ में छपी है जिसे नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के मेहदी बेना ने तैयार की है।

यही नहीं नासा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऐतिहासिक खोज से वैज्ञानिकों को चंद्रमा की सतह पर पानी की स्तिथि जानने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही चंद्रमा के अतीत और दिनों दिन हो रहे विकास के बारे में जानकारी हासिल हो सकेगी। पानी का पता चलने से यह भी जानकारी मिलेगी की चंद्रमा पर स्थित गड्ढों (क्रेटर) में बर्फ की मौजूदगी है या नहीं। हालांकि इस प्रोजेक्ट में लगे वैज्ञानिकों ने यह बात खारिज की है कि धरती की सतह पर और इसके आसपास मौजूद पानी उल्का पिंडों का परिणाम है। वैज्ञानिक ये जरूर मानते हैं कि वायुमंडल में पानी का कुछ अंश चंद्रमा के उल्का पिंडों से आया हो लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता।

साथ ही नासा ने अपने ह्यूमन एक्सप्लोरेशन रोवर चैलेंज के तौर पर भारत की तीन टीमों को पुरस्कार दिया है। इस चैलेंज के तहत हाई स्कूल और कॉलेज के छात्रों को चांद और मंगल ग्रहों पर भविष्य के अभियान के लिए रोविंग एयरक्राफ्ट बनाने और उनका टेस्ट करने के लिए बुलाया जाता है। नासा ने एक बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में केआईईटी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस की टीम ने ‘एआईएए नील आर्मस्ट्रांग बेस्ट डिजाइन अवार्ड’ जीता जो रोवर चैलेंज की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाए गए सबसे अच्छे सिस्टम के लिए दिया जाता है।

बता दें, महाराष्ट्र में मुंबई के मुकेश पटेल स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एंड इंजीनियरिंग ने ‘फ्रैंक जो सेक्सटन मेमोरियल पिट क्रू अवार्ड’जीता है। पंजाब के फगवाड़ा की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की टीम ने रॉकेट और अन्य अंतरिक्ष संबंधित विषयों पर दिए जाने वाले ‘स्टेम एन्गेजमेंट अवार्ड’ दिया। इस प्रतियोगिता में करीब 100 टीमों ने भाग लिया। इसमें अमेरिका, बांग्लादेश, बोलिविया, ब्राजील, डोमिनिक गणराज्य, मिस्र, इथियोपिया, जर्मनी, मैक्सिको, मोरक्को और पेरू समेत रिकॉर्ड संख्या में देशों ने भाग लिया।

नई दिल्ली। दुनिया का सबसे बड़ा स्पेस सेंटर नासा की एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि चंद्रमा पर उल्का बौछारों के दौरान पानी निकलता है। भविष्य के लिए यह स्टडी काफी कारगर साबित हो सकती है क्योंकि पानी की मौजूदगी होने से चंद्रमा पर जीवन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

दरअसल, उल्का से बारिश की ये ऐतिहासिक खोज 'लुनार एट्मसफियर एंड डस्ट इनवायरमेंट एक्सप्लोरर' (एलएडीईई) ने की है जो नासा का अभियान है। एलएडीईई नासा का रोबोटिक मिशन है जिसने चंद्रमा की सतह पर जीवन की संभावनाएं तलाशने के लिए अक्टूबर 2013 से अप्रैल 2014 तक चंद्रमा की ऑरबिट का चक्कर लगाया। इसमें पता चला है कि चंद्रमा पर उल्का बौछार के दौरान पानी डिस्चार्ज होता है।
वहीं, कैलिफोर्निया स्थित सिलिकॉन वैली में नासा के एम्स रिसर्च सेंटर में एलएडीईई प्रोजेक्ट चल रहा है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े एक वैज्ञानिक रिचार्ड एल्फिक ने कहा, 'चंद्रमा पर ज्यादातर वक्त H2O (पानी) और OH की मात्रा नहीं पाई जाती लेकिन चंद्रमा से उल्का पिंड गुजरने पर भाप का पता चला है। उल्का पिंड के गुजरते ही H2O और OH अपने आप समाप्त हो जाता है। ' नासा की एक प्रेस रिलीज में यह बात कही गई है। चंद्रमा पर पानी और भाप से जुड़ी यह स्टडी 'नेचर जियोसाइंस' में छपी है जिसे नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के मेहदी बेना ने तैयार की है।
यही नहीं नासा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऐतिहासिक खोज से वैज्ञानिकों को चंद्रमा की सतह पर पानी की स्तिथि जानने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही चंद्रमा के अतीत और दिनों दिन हो रहे विकास के बारे में जानकारी हासिल हो सकेगी। पानी का पता चलने से यह भी जानकारी मिलेगी की चंद्रमा पर स्थित गड्ढों (क्रेटर) में बर्फ की मौजूदगी है या नहीं। हालांकि इस प्रोजेक्ट में लगे वैज्ञानिकों ने यह बात खारिज की है कि धरती की सतह पर और इसके आसपास मौजूद पानी उल्का पिंडों का परिणाम है। वैज्ञानिक ये जरूर मानते हैं कि वायुमंडल में पानी का कुछ अंश चंद्रमा के उल्का पिंडों से आया हो लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। साथ ही नासा ने अपने ह्यूमन एक्सप्लोरेशन रोवर चैलेंज के तौर पर भारत की तीन टीमों को पुरस्कार दिया है। इस चैलेंज के तहत हाई स्कूल और कॉलेज के छात्रों को चांद और मंगल ग्रहों पर भविष्य के अभियान के लिए रोविंग एयरक्राफ्ट बनाने और उनका टेस्ट करने के लिए बुलाया जाता है। नासा ने एक बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में केआईईटी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस की टीम ने ‘एआईएए नील आर्मस्ट्रांग बेस्ट डिजाइन अवार्ड’ जीता जो रोवर चैलेंज की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाए गए सबसे अच्छे सिस्टम के लिए दिया जाता है। बता दें, महाराष्ट्र में मुंबई के मुकेश पटेल स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एंड इंजीनियरिंग ने ‘फ्रैंक जो सेक्सटन मेमोरियल पिट क्रू अवार्ड’जीता है। पंजाब के फगवाड़ा की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की टीम ने रॉकेट और अन्य अंतरिक्ष संबंधित विषयों पर दिए जाने वाले ‘स्टेम एन्गेजमेंट अवार्ड’ दिया। इस प्रतियोगिता में करीब 100 टीमों ने भाग लिया। इसमें अमेरिका, बांग्लादेश, बोलिविया, ब्राजील, डोमिनिक गणराज्य, मिस्र, इथियोपिया, जर्मनी, मैक्सिको, मोरक्को और पेरू समेत रिकॉर्ड संख्या में देशों ने भाग लिया।