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नौकरशाही की कठपुतली ‘सरकार’

Naukarshahi Ki Kathputali Sarkar

नई दिल्ली। आम जनता से विचारकों के मन में लम्बे समय से एक उहापोह चल रही है कि देश को आखिर चला कौन रहा है। वह नेता जो चुनाव जीतकर पांच साल के लिए कुर्सी पर बैठते हैं या फिर वो नौकरशाह जो सिर्फ एक बार परीक्षा पास करके 60 साल तक सत्ता को उंगलियों पर नचाते हैं। अतीत में झांके तो दिखता है बेलगाम नौकरशाही ने दर्जनों सरकारों का बेड़ा गर्क कर उन्हें गुमनामी के अंधकार में धकेल दिया। अफसरों पर भरोसा करके कई बड़े बड़े नेताओं ने अपना राजनैतिक कैरियर तबाह कर लिया। लेकिन हजारों करोड़ के घोटाले करके भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नौकरशाही पर आंच तक नहीं आई।

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अफसरशाही पर लगाम लगाने के लिए अनुभवी और समझदार नेताओं की कमी निराशा का भाव पैदा करती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक नौकरशाही और उनके मित्र व्यवसाईयों के हाथ देश के आम नागरिक का हित बिकता रहेगा। आलम यह है कि जनहित की अधिकांश योजनाओं को अफसर अपने व्यवसायी मित्रों के साथ मिलकर बांट लेते हैं। मामला खुलता है तो चहेते को जांच देकर निपटा दिया जाता है।

हमारे देश एक तरफ कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ रहा है। पूरे देश में लाखों मजदूरों के पलायन की खबरें ज़ोरों से सामने आ रही है। इस बीच कुछ सवाल पूरे देश की नौकरशाही और राजनेताओं को लेकर खड़े हो गए हैं। हमारे देश की राजनीति में आने के लिए किसी के लिए कोई मानक तय नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ सरकारी मशीनरी को चलाने के लिए नौकरशाही का पूरा दिमाग होता है। इसका पूरा खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ता है। सरकार चलाने के लिए अनुभवहीन नेता पूरी तरह से नौकरशाही पर निर्भर हो जाते हैं, जिसकी वजह से नेताओं का आम जनता से सीधा संपर्क टूट जाता है और जमीन से जुड़े मुद्दे उनके सामने नहीं आ पाते हैं। इसका जीता जागता उदाहरण इस लॉकडाउन में देखने को मिला है।

अफसरों के बीच आपसी खींचतान का नतीजा मजदूरों के पलायन में देखने को मिला है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों और जिम्मेदार मंत्रियों तक आम जनता की समस्याएँ सीधे तौर पर नहीं पहुंच पायी, जिसकी वजह से इतने बड़े पैमाने पर कई हादसे हो गए और कई मजदूरों की हादसों में मौत हो गयी। इन सब के बीच जो बड़ी बात सामने आई है, उसमें बड़ी समस्या सूचनाओं का आला-कमान का ना पहुंच पाना है। नौकरशाही किसी भी प्रदेश को चलाने की बेहद अहम कड़ी मानी जाती है। हालांकि इन सब के बीच सरकार चलाने वाले मुखिया को ही सारी समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है। सवाल ये उठता है कि क्या राजनीति में आने वाले समय में कोई मानक तय हो सकेंगे, जिसके आधार पर उनका चयन हो और वो जनता के मत से सत्तासीन हो सकें।

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