नवाज ने दी पाक सेना को चेतावनी, ‘आतंक का खात्मा करो वरना अलग-थलग पड़ जाएंगे’

इस्लामाबाद| पाकिस्तान की आतंकवाद समर्थक नीति पर भारत के कूटनीतिक हमले के बाद वैश्विक अलगाव से परेशान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सेना नेतृत्व से आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने और 2008 के मुंबई आतंकी हमले और 2016 के पठानकोट आतंकी हमले की जांच जल्द पूरी करने को कहा है। पाकिस्तान से वार्ता बहाली के लिए भारत की यह दो प्रमुख मांगें हैं। पाकिस्तान के समाचार पत्र ‘डॉन’ ने सूत्रों के हवाले से गुरुवार को कहा कि इंटर सर्विस इंटेलिजेंस (आईएसआई) प्रमुख जनरल रिजवान अख्तर के साथ नागरिक अधिकारियों की एक उच्चस्तरीय बैठक में शरीफ ने खुले और स्पष्ट शब्दों में यह बात कही।




विदेश सचिव एजाज चौधरी ने बुधवार को बैठक में चौंकाने वाली स्वीकारोक्ति में कहा, “पाकिस्तान कूटनीतिक अलगाव का सामना कर रहा है और दुनिया की प्रमुख राजधानियों में उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जा रही है।” डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, चौधरी ने कहा कि यहां तक कि पाकिस्तान के सबसे करीबी चीन ने भी जैश-ए-मोहम्मदके सरगना मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने पर संयुक्त राष्ट्र में बार-बार रोक लगाने के तर्क पर सवाल उठाया है। इतना ही नहीं, भारत-पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों के बीच कुछ सीनेटरों ने पाकिस्तान को भारत के साथ फिर से वार्ता शुरू करने के लिए कहा, भले ही इसका स्वरूप औपचारिक न हो।

गुरुवार को पीपीपी नेता ऐतजाज अहसान ने भी ‘नॉन स्टेट एक्टर्स’ (गैर राजकीय तत्वों) पर नियंत्रण करने में नाकामी को लेकर सरकार की निंदा की, जिसके कारण देश को कूटनीतिक अलगाव की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। डॉन की रिपोर्ट में कहा गया है कि बुधवार की बैठक में पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ (नवाज शरीफ के छोटे भाई) और खुफिया एजेंसी के प्रमुख के बीच कड़ी शाब्दिक तकरार हुई। भारत ने 18 सितंबर को कश्मीर के उड़ी में एक सैन्य शिविर पर हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मांग की थी। भारत ने कहा कि इस हमले में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मदका हाथ था।



उड़ी हमले के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक कर कम से कम सात आतंकवादी लॉन्च पैड्स को ध्वस्त कर दिया और अज्ञात संख्या में आतंकवादियों को मार गिराया। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के ‘कूटनीतिक युद्ध’ के कारण इस्लामाबाद में नवंबर में होने वाला दक्षेस सम्मेलन भी रद्द हो गया। दुनिया के प्रमुख देशों ने आईएसआई के संरक्षण प्राप्त आतंकवादी समूहों के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा कार्रवाई किए जाने की भारत की मांग का समर्थन किया है। समाचार पत्र डॉन ने कहा कि सरकार ने आईएसआई को ‘पाकिस्तान के लिए बढ़ रहे अंतर्राष्ट्रीय अलगाव की सूचना दी है और सरकार के कई महत्वपूर्ण कामों पर आम सहमति की मांग की है।’

‘डॉन’ ने कहा कि सरकार ने सैन्य नेतृत्व वाली खुफिया एजेंसियों को खुली और अप्रत्याशित चेतावनी देते हुए कहा है कि ‘अगर कानून प्रवर्तन एजेंसियां प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करती हैं तो वे हस्तक्षेप न करें।’ अभी तक इन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई नागरिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र से बाहर मानी जाती रही है। समाचार पत्र के मुताबिक, “प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पठानकोट जांच को पूरा करने के लिए नए प्रयास करने और रावलपिंडी की एक आतंकवाद रोधी अदालत में लटके मुंबई हमले के मुकदमे को फिर से शुरू करने का निर्देश दिया है।”

मुंबई हमले में लश्कर-ए-तैयबा का हाथ माना जाता है जबकि पठानकोट हमले के पीछे जैश के आतंकियों का हाथ बताया जाता है। समाचार पत्र के मुताबिक, एजाज चौधरी ने कहा कि अफगानिस्तान में सक्रिय हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने की अमेरिका की मांग के कारण अमेरिका से पाकिस्तान के रिश्ते खराब हुए हैं और इनके और खराब होने का अंदेशा है। भारत के साथ खराब होते रिश्तों की बात करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत की प्रमुख मांगें पठानकोट हमले की जांच पूरी करना और जैश के खिलाफ ‘नजर आने वाली कार्रवाई’ करना है।

डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, “चौधरी ने सलाह दी है कि हालांकि चीन ने पाकिस्तान के साथ अपना समर्थन दोहराया है, लेकिन उसने भी पाकिस्तान की कार्यप्रणाली में बदलाव की इच्छा का संकेत जताया है।” रिपोर्ट के मुताबिक विदेश सचिव की अप्रत्याशित व स्पष्ट बातों के बाद बैठक में नागरिक संस्थाओं के अधिकारियों व आईएसआई प्रमुख के बीच बेहद तीखी तकरार हुई। अखबार ने बताया कि शहबाज शरीफ ने आईएसआई प्रमुख से शिकायत की कि जब भी नागरिक अधिकारियों द्वारा कुछ समूहों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, सुरक्षा प्रतिष्ठान पर्दे के पीछे काम करते हैं और गिरफ्तार व्यक्तियों को मुक्त कर देते हैं। डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, आईएसआई प्रमुख ने चेतावनी दी कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को ‘भारतीय दबाव के आगे घुटने टेकने या कश्मीरी लोगों को छोड़ देने’ के तौर पर देखा जाएगा।



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