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लापरवाही : ​पढ़ाना छोड़ अन्य कामों में जुटे प्राइमरी के शिक्षक, कहीं बांट रहे स्वेटर तो कहीं फरमा रहे आराम

Negligence The Primary Teachers Engaged In Other Work Leaving The Teaching Distributing Sweaters And Resting Elsewhere

By शिव मौर्या 
Updated Date

लखनऊ। यूपी की प्राइमरी शिक्षा राम भरोसे है। कई विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं तो कहीं उनकी मौजूदगी में भी पढ़ाई नहीं हो पा रही है। दरअसल, इस समय ज्यादातर ​विद्यालयों में पढ़ाना छोड़ ​शिक्षक स्वेटर बांटने में व्यस्त नजर आ रहे हैं। स्वेटर बांटने की आखिरी तारिख बीत जाने के बाद भी प्राइमरी स्कूलों में अभी तक 60 फीसदी बच्चों को ही स्वेटर मिल सका है।

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वहीं, जहां इस समय स्वेटर वितरण किया जा रहा है, वहां पर ज्यादातर साइज की दिक्कत सामने आ रही है। ऐसे में ​शिक्षक छात्रों को पढ़ाना छोड़ बीआरसी से बच्चों की नाप के मुताबिक स्वेटर छांटने में जुटे हुए हैं। बता दें कि, इस बार राज्य सरकार ने स्वेटर जेम पोर्टल से खरीदे हैं। कंपनी स्वेटर के बंडल को बीआरसी तक पहुंचा रही है। यहां से स्कूलों तक स्वेटर ले जाने की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों पर है।

दरअसल, इसको लेकर जारी शासनादेश में कहा गया है कि कंपनी ब्लॉक तक स्वेटर पहुंचाएगी। स्वेटर वितरण की पूरी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधक को दी गयी है। लेकिन स्वेटर स्कूल तक पहुंचे कैसे इसके लिए कोई दिशानिर्देश नहीं दिए गए हैं। इस कारण स्कूलों के शिक्षकों को ही यह जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। महानिदेशक स्कूल शिक्षा विजय किरण आनंद का कहना है कि 60 प्रतिशत स्वेटर वितरण किया जा चुका है। जिले के डीएम इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं।

शिक्षक अपने साधन से ढो रहे स्वेटर का बंडल
स्कूलों तक स्वेटरों का बंडल पहुंचाने का जिम्मा वहां के शिक्षकों का है। कहीं, वह साइकिल तो कहीं मोटरसाइकिल से स्वेट का बंडल ढो रहे हैं। वहीं, कभी कभी बंडल में स्वेटरों की कमी होने पर वह दोबारा बीआरसी के चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

बिना स्वेटर स्कूल आने को मजबूर
समय से स्वेटर नहीं बंटने के कारण कई बच्चे बिना स्वेटर ही स्कूल आने को मजबूर हैं। विभाग का दावा है कि अभी तक 60 प्रतिशत से ज्यादा स्वेटर बांट दिए गए हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सूत्रों की माने तो अभी तक यूपी की ज्यादातर स्कूलों में स्वेटर नहीं बांटे गए हैं, जिसके कारण ठंड में बच्चे बिना स्वेटर आने को मजबूर हैं।

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