बिहार की राजनीति में अटकलों को हवा दे गई नीतीश और तेजस्‍वी की मुलाकात

Tejashwi Yadav, CM Nitish Kumar
तेजस्वी यादव का नीतीश कुमार पर हमला- बिहार सीएम की नियत पर उठाये सवाल

पटना। बिहार में बजट सत्र के दौरान धुर विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद नेता तेजस्वी यादव की लगातार दो दिन बंद कमरे में हुई मुलाकात से राजनीति गर्मा गई है। हालांकि अभी दोनों ही दल इसे औपचारिक मुलाकात ठहरा रहे हैं, लेकिन दुनिया जानती है कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थाई नहीं होती है।

Nitish And Tejashwi Meet Speculation In Bihar Politics :

इस मुलाकात से जदयू गठबंधन सरकार चला रही भाजपा की बेचैनी बढ़ गई। चूंकि बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश महागठबंधन में थे। इस गठबंधन ने भाजपा के खिलाफ प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। नीतीश मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी उप मुख्यमंत्री। समय बीता और फिर बाजी पलटी, नीतीश तो भाजपा का साथ लेकर मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन तेजस्वी बाहर हो गए।

तबसे एकदूसरे के खिलाफ तल्ख टिप्पणियां जारी थीं। लेकिन 25 फरवरी को बजट सत्र के दौरान नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) व नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर विपक्ष कार्य स्थगन प्रस्ताव लाया। माना जाता है कि इसे बमुश्किल स्वीकार किया जाता, लेकिन थोड़ी ही देर में इसे मंजूरी दे दी गई।

तेजस्वी ने बोलना शुरू किया और इसे काला कानून बता दिया। बस, फिर क्या था भाजपाई विरोध कर बैठे। दोनों दलों में हाथापाई की नौबत आ गई। सदन पंद्रह मिनट के लिए स्थगित हो गया। बाहर निकल कर तेजस्वी ने भाजपा के खिलाफ तो बोला, लेकिन नीतीश पर कोई कड़ा बयान नहीं दिया। उन्होंने इस पर दो दिन पहले नीतीश की ओर से एनपीआर के 2010 वाले प्रारूप का समर्थन किए जाने को याद दिलाया। इसके बाद विधानसभा में ही दोनों की एकांत में मुलाकात हुई और प्रस्ताव लाया गया कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा व एनपीआर 2010 के आधार पर ही होना चाहिए।

भाजपा को भी साथ देना पड़ा। इसे लेकर राजनीतिक हलके में तरह- तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। राजद इसे अपनी जीत मान रहा था और सत्ता पक्ष इसे विपक्ष के मुद्दे की हवा निकालने वाला करार दे रहा था। भाजपा में भी दो मत नजर आने लगे। एक पक्ष कार्यस्थगन प्रस्ताव से लेकर एनआरसी व एनपीआर पर हुए निर्णय को सदन पूर्व तय की गई रणनीति करार देने में जुटा था तो दूसरा पक्ष इसे संदेह की दृष्टि से देख रहा था। उसका कहना था कि अगर ऐसा था तो विधायकों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया। तरह-तरह के बयान आने लगे।

पटना। बिहार में बजट सत्र के दौरान धुर विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद नेता तेजस्वी यादव की लगातार दो दिन बंद कमरे में हुई मुलाकात से राजनीति गर्मा गई है। हालांकि अभी दोनों ही दल इसे औपचारिक मुलाकात ठहरा रहे हैं, लेकिन दुनिया जानती है कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थाई नहीं होती है। इस मुलाकात से जदयू गठबंधन सरकार चला रही भाजपा की बेचैनी बढ़ गई। चूंकि बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश महागठबंधन में थे। इस गठबंधन ने भाजपा के खिलाफ प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। नीतीश मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी उप मुख्यमंत्री। समय बीता और फिर बाजी पलटी, नीतीश तो भाजपा का साथ लेकर मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन तेजस्वी बाहर हो गए। तबसे एकदूसरे के खिलाफ तल्ख टिप्पणियां जारी थीं। लेकिन 25 फरवरी को बजट सत्र के दौरान नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) व नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर विपक्ष कार्य स्थगन प्रस्ताव लाया। माना जाता है कि इसे बमुश्किल स्वीकार किया जाता, लेकिन थोड़ी ही देर में इसे मंजूरी दे दी गई। तेजस्वी ने बोलना शुरू किया और इसे काला कानून बता दिया। बस, फिर क्या था भाजपाई विरोध कर बैठे। दोनों दलों में हाथापाई की नौबत आ गई। सदन पंद्रह मिनट के लिए स्थगित हो गया। बाहर निकल कर तेजस्वी ने भाजपा के खिलाफ तो बोला, लेकिन नीतीश पर कोई कड़ा बयान नहीं दिया। उन्होंने इस पर दो दिन पहले नीतीश की ओर से एनपीआर के 2010 वाले प्रारूप का समर्थन किए जाने को याद दिलाया। इसके बाद विधानसभा में ही दोनों की एकांत में मुलाकात हुई और प्रस्ताव लाया गया कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा व एनपीआर 2010 के आधार पर ही होना चाहिए। भाजपा को भी साथ देना पड़ा। इसे लेकर राजनीतिक हलके में तरह- तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। राजद इसे अपनी जीत मान रहा था और सत्ता पक्ष इसे विपक्ष के मुद्दे की हवा निकालने वाला करार दे रहा था। भाजपा में भी दो मत नजर आने लगे। एक पक्ष कार्यस्थगन प्रस्ताव से लेकर एनआरसी व एनपीआर पर हुए निर्णय को सदन पूर्व तय की गई रणनीति करार देने में जुटा था तो दूसरा पक्ष इसे संदेह की दृष्टि से देख रहा था। उसका कहना था कि अगर ऐसा था तो विधायकों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया। तरह-तरह के बयान आने लगे।