सोनभद्र में एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की वनभूमि पर नेता, अफसर और माफियाओं का कब्जा

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सोनभद्र में एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की वनभूमि पर नेता, अफसर और माफियाओं का कब्जा

लखनऊ। सोनभद्र में जमीन पर कब्जे को लेकर नरसंहार की बुनियाद कोई एक दिन में नहीं रखी गई थी। यहां वर्षों से वन विभाग की जमीन को लूटने का सिलसिला चल रहा है। यह सब वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से होता रहा, जिसके कारण यहां पर नेता, अफसर और माफियाओं ने एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की वन भूमि पर अपना कब्जा जमा लिया। यहां पोस्टिंग पाने वाले अफसरों ने तो अपनी कई पीढ़ियों के भरण पोषण तक भी इंतजाम कर दिया। वन भूमि को लूटता देख वन संरक्षक एके जैन ने शासन को एक रिपोर्ट दी थी।

Over One Lakh Hectares Of Forest Land In Sonbhadra Captured By Leaders Officers And Mafia :

इस रिपोर्ट में उन्होंने मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी। हालांकि, मौजूदा प्रदेश सरकार ने इस रिपोर्ट को फाइलों में ही दफन कर दिया, जिसके कारण सोनभद्र जैसी जघंन्य घटना सामने आई है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञओं का कहना है कि, अगर समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इस तर की घटनाओं को रोकना मुश्किल हो जायेगा।

मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने शासन को 2014 में एक रिपोर्ट दी थी। इसमें उन्होंने कहा, था कि, सोनभद्र में जंगल की जमीन की लूट मची है। अब तक एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की जमीन पर बाहर से आये ‘रसूखदार’ लोगों ने कब्जा कर लिया है या​ फिर उनकी संस्थाओं के नाम कर दिया गया है। यह प्रदेश की कुल वन भूमि का छह प्रतिशत हिस्सा है। जैन ने पूरे मामले से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराने की सिफारिश भी की थी। जैन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि, वन भूमि को साजिश के तहत गैर वनभूमि में बदलने का सिलसिला जारी है।

अपने चेहतों को यह जमीने रेवड़ियों की तरह बांटी जा रही हैं। जंगल की जमीन में लूट में किस तरह सरकार चुप्पी ओढ़े रहती है, इसको इस बात से समझा जा सकता है कि 2009 में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि सोनभद्र में गैर वन भूमि क्षेत्र घोषित करने में वन बंदोबस्त अधिकारी (एफएसओ) ने अधिकारों का दुरुपयोग किया। वहीं, इस याचिका को 19 सितंबर 2012 को तत्कालीन सचिव (वन) के मौखिक आदेश पर विभागीय वकील ने इसे चुपचाप वापस ले लिया।

हालात का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि चार दशक पहले सोनभद्र के रेनूकूट इलाके में 1,75,896.490 हेक्टेयर भूमि को धारा-4 के तहत लाया गया था, लेकिन इसमें से मात्र 49,044.89 हेक्टेयर जमीन ही वन विभाग को पक्के तौर पर (धारा-20 के तहत) मिल सकी। यही हाल ओबरा व सोनभद्र वन प्रभाग और कैमूर वन्य जीव विहार क्षेत्र में है।

लखनऊ। सोनभद्र में जमीन पर कब्जे को लेकर नरसंहार की बुनियाद कोई एक दिन में नहीं रखी गई थी। यहां वर्षों से वन विभाग की जमीन को लूटने का सिलसिला चल रहा है। यह सब वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से होता रहा, जिसके कारण यहां पर नेता, अफसर और माफियाओं ने एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की वन भूमि पर अपना कब्जा जमा लिया। यहां पोस्टिंग पाने वाले अफसरों ने तो अपनी कई पीढ़ियों के भरण पोषण तक भी इंतजाम कर दिया। वन भूमि को लूटता देख वन संरक्षक एके जैन ने शासन को एक रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की थी। हालांकि, मौजूदा प्रदेश सरकार ने इस रिपोर्ट को फाइलों में ही दफन कर दिया, जिसके कारण सोनभद्र जैसी जघंन्य घटना सामने आई है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञओं का कहना है कि, अगर समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इस तर की घटनाओं को रोकना मुश्किल हो जायेगा। मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने शासन को 2014 में एक रिपोर्ट दी थी। इसमें उन्होंने कहा, था कि, सोनभद्र में जंगल की जमीन की लूट मची है। अब तक एक लाख हेक्टेअर से ज्यादा की जमीन पर बाहर से आये 'रसूखदार' लोगों ने कब्जा कर लिया है या​ फिर उनकी संस्थाओं के नाम कर दिया गया है। यह प्रदेश की कुल वन भूमि का छह प्रतिशत हिस्सा है। जैन ने पूरे मामले से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराने की सिफारिश भी की थी। जैन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि, वन भूमि को साजिश के तहत गैर वनभूमि में बदलने का सिलसिला जारी है। अपने चेहतों को यह जमीने रेवड़ियों की तरह बांटी जा रही हैं। जंगल की जमीन में लूट में किस तरह सरकार चुप्पी ओढ़े रहती है, इसको इस बात से समझा जा सकता है कि 2009 में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि सोनभद्र में गैर वन भूमि क्षेत्र घोषित करने में वन बंदोबस्त अधिकारी (एफएसओ) ने अधिकारों का दुरुपयोग किया। वहीं, इस याचिका को 19 सितंबर 2012 को तत्कालीन सचिव (वन) के मौखिक आदेश पर विभागीय वकील ने इसे चुपचाप वापस ले लिया। हालात का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि चार दशक पहले सोनभद्र के रेनूकूट इलाके में 1,75,896.490 हेक्टेयर भूमि को धारा-4 के तहत लाया गया था, लेकिन इसमें से मात्र 49,044.89 हेक्टेयर जमीन ही वन विभाग को पक्के तौर पर (धारा-20 के तहत) मिल सकी। यही हाल ओबरा व सोनभद्र वन प्रभाग और कैमूर वन्य जीव विहार क्षेत्र में है।