गरीब बाप का दर्द: दिव्यांग बेटे की खोज में 1500 किलोमीटर चला डाली साइकिल

Satish-Chand1

लखनऊ। औलाद भले ही अपने मां—बाप की फिक्र करे लेकिन यह सच है कि दुनिया में मां बाप से ज्यादा प्यार कोई और नहीं कर सकता। इसकी जीती जागती तस्वीर हैं हाथरस के द्वारिकापुर गांव निवासी 48 वर्षीय सतीश चन्द्र। जोकि छह महीने पहले गायब हुए अपने बेटे की तलाश में साइकिल पर घर से निकल लिए हैं। सतीश ने अपने बेटे की तलाश में यूपी, हरियाणा और दिल्ली की सड़कों पर 1500 किलोमीटर की यात्रा तय की है। इन दिनों वे आगरा में अपने बेटे को तलाश कर रहे हैं।

Painful Plight Of Poor Father Roaming On Cycle In Search Of His Missing Son :

निम्न वर्गीय किसान सतीश चन्द्र की माने तो उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं ​है। 24 जून की सुबह स्कूल गया उनका 10 वर्षीय दिव्यांग बेटा गोदना स्कूल से वापस नहीं लौटा था। गोदना मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर था। जिस वजह से सतीश चन्द्र ने बेटे को चार दिन तक तलाश किया लेकिन न मिलने पर उसने पुलिस में जाकर शिकायत दर्ज करवाने के लिए अर्जी दी। पुलिस वालों ने कई बार टालने के बाद उसके शिकायत पत्र पर एक मोहर लगा कर उसे वापस लौटा दिया।

सतीश चन्द्र की माने तो पुलिस का रवैया देखकर उसे लग गया था कि पुलिस उसकी कोई मदद नहीं करेगी। जिसके बाद उसने अपने बेटे की एक तस्वीर लेकर हाथरस से जाने वाले तमाम रास्तों पर पड़ने वाले शहरों, कस्बों और गांवों में जा जाकर अपने बेटे की तलाश शुरू कर दी। अब तक वह लाखों लोगों को अपने बेटे की तस्वीर दिखा चुके हैं।

सतीश की परेशानी इतनी भर नहीं है। अपनी ढ़लती उम्र का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि लोगों ने कहा कि बेटे को कितना ढूंढ़ोंगे। कई बार हिम्मत टूटी लेकिन घर में बैठी 40 वर्षीय पत्नी ने उम्मीद नहीं छोड़ी उसे लगता है कि उसका बेटा वापस आएगा। अपने परिवार की कहानी सुनाते हुए आंखों में नमी लिए सतीश कहते हैं कि 2005 में बड़ी बेटी सरिता की बीमारी के चलते मौत हो गई। जिसके बाद 9 साल का बेटा था, जो एक सड़क हादसे में चल बसा। अब गोदना ही बचा था, जिसके सहारे वह अपनी पत्नी के साथ जिन्दगी को स्वीकार कर चुका था, लेकिन उसकी गुमशुदगी ने उन्हें तोड़ दिया।

खुद को किसान बताने वाले सतीश चन्द्र का कहना है कि वह अपनी असलियत से बाकिफ हैं, उनके पास बेहद कम संसाधन हैं। इतना पैसा उनके पास नहीं है कि वह बस और ट्रेन के किराए पर खर्च कर सकें। न ही उनके पास कोई ऐसी पहुंच है जिसके दम पर वह पुलिस को उनके बेटे की खोज के लिए दबाव बनवा सकें।

अपनी हिम्मत भर प्रयास करने के बाद सतीश को आगरा में रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस के बारे में जानकारी मिली। पारस बच्चों के अधिकार के लिए आवाज उठाते रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक नरेश पारस ने सतीश चन्द्र की व्यथा सुनने के बाद ट्विटर के माध्यम से उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों को सतीश चन्द्र की परेशानी से अवगत करवाया है, जिसे संज्ञान में लिया जा चुका है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल के माध्यम से सतीश चन्द्र की गुहार मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाने का काम भी किया है।

पारस का कहना है कि पिछले सप्ताह सतीश चन्द्र को एत्मादपुर इलाके में बेटे की तस्वीर के साथ कुछ लोगों ने देखा था। शरीर से कमजोर, भूखे और परेशान सतीश को किसी ने उनका पता दे दिया। जब वह यहां पहुंचे तो उन्होने उनकी मदद करने का फैसला कर लिया।

लखनऊ। औलाद भले ही अपने मां—बाप की फिक्र करे लेकिन यह सच है कि दुनिया में मां बाप से ज्यादा प्यार कोई और नहीं कर सकता। इसकी जीती जागती तस्वीर हैं हाथरस के द्वारिकापुर गांव निवासी 48 वर्षीय सतीश चन्द्र। जोकि छह महीने पहले गायब हुए अपने बेटे की तलाश में साइकिल पर घर से निकल लिए हैं। सतीश ने अपने बेटे की तलाश में यूपी, हरियाणा और दिल्ली की सड़कों पर 1500 किलोमीटर की यात्रा तय की है। इन दिनों वे आगरा में अपने बेटे को तलाश कर रहे हैं।निम्न वर्गीय किसान सतीश चन्द्र की माने तो उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं ​है। 24 जून की सुबह स्कूल गया उनका 10 वर्षीय दिव्यांग बेटा गोदना स्कूल से वापस नहीं लौटा था। गोदना मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर था। जिस वजह से सतीश चन्द्र ने बेटे को चार दिन तक तलाश किया लेकिन न मिलने पर उसने पुलिस में जाकर शिकायत दर्ज करवाने के लिए अर्जी दी। पुलिस वालों ने कई बार टालने के बाद उसके शिकायत पत्र पर एक मोहर लगा कर उसे वापस लौटा दिया।सतीश चन्द्र की माने तो पुलिस का रवैया देखकर उसे लग गया था कि पुलिस उसकी कोई मदद नहीं करेगी। जिसके बाद उसने अपने बेटे की एक तस्वीर लेकर हाथरस से जाने वाले तमाम रास्तों पर पड़ने वाले शहरों, कस्बों और गांवों में जा जाकर अपने बेटे की तलाश शुरू कर दी। अब तक वह लाखों लोगों को अपने बेटे की तस्वीर दिखा चुके हैं।सतीश की परेशानी इतनी भर नहीं है। अपनी ढ़लती उम्र का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि लोगों ने कहा कि बेटे को कितना ढूंढ़ोंगे। कई बार हिम्मत टूटी लेकिन घर में बैठी 40 वर्षीय पत्नी ने उम्मीद नहीं छोड़ी उसे लगता है कि उसका बेटा वापस आएगा। अपने परिवार की कहानी सुनाते हुए आंखों में नमी लिए सतीश कहते हैं कि 2005 में बड़ी बेटी सरिता की बीमारी के चलते मौत हो गई। जिसके बाद 9 साल का बेटा था, जो एक सड़क हादसे में चल बसा। अब गोदना ही बचा था, जिसके सहारे वह अपनी पत्नी के साथ जिन्दगी को स्वीकार कर चुका था, लेकिन उसकी गुमशुदगी ने उन्हें तोड़ दिया।खुद को किसान बताने वाले सतीश चन्द्र का कहना है कि वह अपनी असलियत से बाकिफ हैं, उनके पास बेहद कम संसाधन हैं। इतना पैसा उनके पास नहीं है कि वह बस और ट्रेन के किराए पर खर्च कर सकें। न ही उनके पास कोई ऐसी पहुंच है जिसके दम पर वह पुलिस को उनके बेटे की खोज के लिए दबाव बनवा सकें।अपनी हिम्मत भर प्रयास करने के बाद सतीश को आगरा में रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस के बारे में जानकारी मिली। पारस बच्चों के अधिकार के लिए आवाज उठाते रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक नरेश पारस ने सतीश चन्द्र की व्यथा सुनने के बाद ट्विटर के माध्यम से उत्तर प्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों को सतीश चन्द्र की परेशानी से अवगत करवाया है, जिसे संज्ञान में लिया जा चुका है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल के माध्यम से सतीश चन्द्र की गुहार मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाने का काम भी किया है।पारस का कहना है कि पिछले सप्ताह सतीश चन्द्र को एत्मादपुर इलाके में बेटे की तस्वीर के साथ कुछ लोगों ने देखा था। शरीर से कमजोर, भूखे और परेशान सतीश को किसी ने उनका पता दे दिया। जब वह यहां पहुंचे तो उन्होने उनकी मदद करने का फैसला कर लिया।