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लिव-इन पार्टनर से संबंध बनाना रेप नहीं : सुप्रीम कोर्ट

By रवि तिवारी 
Updated Date

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिव-इन पार्टनर के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं होता, अगर व्यक्ति अपने नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों के कारण महिला से शादी नहीं कर पाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिव-इन पार्टनर के बीच सहमति से बना शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं होता, अगर व्यक्ति अपने नियंत्रण के बाहर की परिस्थितियों के कारण महिला से शादी नहीं कर पाता है।

न्यायमूर्ति ए. के. सिकरी और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर की पीठ ने हाल में दिए गए एक फैसले में कहा, ‘रेप और सहमति से बनाए गए यौन संबंध के बीच स्पष्ट अंतर है। इस तरह के मामलों को अदालत को पूरी सतर्कता से परखना चाहिए कि क्या शिकायतकर्ता वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या उसकी गलत मंशा थी और अपनी यौन इच्छा को पूरा करने के लिए उसने झूठा वादा किया था क्योंकि गलत मंशा या झूठा वादा करना ठगी या धोखा करना होता है।’ पीठ ने यह भी कहा, ‘अगर आरोपी ने पीड़िता के साथ यौन इच्छा की पूर्ति के एकमात्र उद्देश्य से वादा नहीं किया है तो इस तरह का काम बलात्कार नहीं माना जाएगा।’

महाराष्ट्र के मामले में एफआईआर के मुताबिक एक विधवा महिला को डॉक्टर से प्यार हो गया था और वे उसके साथ रहने लगी थीं। पीठ ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति की कोई मंशा या गलत इरादे थे, तो यह बलात्कार का एक स्पष्ट मामला था। पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच स्वीकार किए गए शारीरिक संबंध आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) के तहत अपराध नहीं होंगे।

मामले के तथ्यों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि वे काफी समय से साथ रह रहे थे और जब महिला को पता चला कि उस आदमी ने किसी और से शादी कर ली है तो उसने शिकायत दर्ज कराई। पीठ ने कहा कि हमारा विचार है कि भले ही शिकायत में लगाए गए आरोपों को उनके अंकित मूल्य पर लिया जाए और उनकी संपूर्णता में स्वीकार किया जाए, लेकिन वे अपीलकर्ता (डॉक्टर) के खिलाफ मामला नहीं बनाते हैं।

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