2019 से पहले विपक्ष खत्म करने की तैयारी में है मोदी—शाह की जोड़ी

नई दिल्ली। बिहार, गुजरात और फिर उत्तर प्रदेश तीनों राज्यों की राजनीति इन दिनों गरम है। दिल्ली की राजनीति के नजरिए से देखा जाए तो जिस तरह से बिहार में महागठबंधन की सरकार को विस्थापित कर बीजेपी ने नीतीश कुमार और जदयू को अपने पाले में खड़ा किया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सलाहकार अमित शाह की कूटनीतिक सोच को दर्शाता है।

वहीं गुजरात की स्थिति देखी जाए तो लगता है कि 15 सालों से लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस ना उम्मीदी का शिकार हो गई है। जिस तरह से पार्टी के सबसे बड़े नेता शंकर सिंह बघेला ने पार्टी को राज्यसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनावों को नजरंदाज ​करते हुए पार्टी से इस्तीफा दिया, उससे यही संदेश जाता है कि कांग्रेस के गुजरात कैडर को विश्वास हो चला है कि वह परिवर्तन लाने की स्थिति में नहीं हैं। बेहतर है वे अपना समय और ऊर्जा को सही जगह लगाएं ताकि संघर्ष के इतर राजनीति में रहने का कोई लाभ उन्हें भी मिल सके। परिणाम स्वरूप 6 कांग्रेसी विधायकों ने इस्तीफा देकर बीजेपी में अपनी आस्था प्रकट कर दी।

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ऐसा ही कुछ यूपी में होता नजर आ रहा है। भाजपा जितनी ताकत के साथ विधानसभा चुनावों में उभरी उससे विरोधियों के पैर उखड़ गए हैं। अखिलेश यादव के रूप में जो युवा नेतृत्व उनके पास बचा है वह उनकी पारिवारिक सियासत के चलते विश्वसनीय खोता नजर आ रहा है। दलितों और पिछड़ों की राजनीति के फार्मूले पर चलकर तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची मायावती की हालत ऐसी है कि वह अपने दम पर राज्यसभा तक जाने की हालत में नहीं है। यूपी में भाजपा को छोड़कर तमाम दलों में राजनीति का मतलब संघर्ष मात्र रह गया है। परिणाम स्वरूप सपा और बसपा के लोग बीजेपी का दामन थामने को आतुर नजर आ रहे हैं।

इन राज्यों की वर्तमान राजनीति को देखा जाए तो 2019 के लोकसभा चुनावों की सियासत को लेकर एक तस्वीर उभरती है। जिसमें साफ नजर आता है कि जिस गुजरात से चलकर नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे वहां भाजपा और मजबूत हो रही है। जिस उत्तर प्रदेश ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई उस राज्य की सत्ता भाजपा के पास होने के साथ—साथ विपक्ष पूरी तरह से नेतृत्व विहीन है। इसके अलावा बिहार एक मात्र ऐसा राज्य था जहां से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद नाकामी मिली थी। जिसे मोदी—शाह की जोड़ी ने अपनी कूटनीति और महागठबंधन के बीच की फूट का फायदा उठाकर सफलता में बदल लिया है।

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सियासी पंडित भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने आज कोई चेहरा नहीं है जो उनके कद और लोकप्रियता को चुनौती दे सके। कांग्रेस जिस राहुल गांधी पर दांव लगाती आ रही है उनकी विश्वसनीयता पार्टी के भीतर ही खत्म होती नजर आ रही है। ले दे कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक ऐसा चेहरा थे जिस पर विपक्ष को आखिरी उम्मीद थी। जो अब खत्म हो चुकी है।

इस पूरे आंकलन के आधार पर यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 में किए अपने वादे भले ही पूरे न कर पाए हों, लेकिन उन्होंने मोदी नाम की ब्रांड को इतना बड़ा जरूर बना दिया है कि लोग उस पर विश्वास करने को अभी भी तैयार हैं। वह सत्ता में रहते हुए वह काम कर रहे हैं जो विपक्ष को करने चाहिए थे, मतलब उन्होंने विपक्ष को कमजोर करने की कोई कसर नहीं छोड़ी।

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