राजस्थान में सियासी संकट गहराया, गिर सकती है सरकार

ashok gahlot
राजस्थान: गहलोत सरकार को बड़ी राहत, बीएसपी विधायकों के विलय की दाखिल याचिका खारिज

नई दिल्ली: राजस्थान में सियासी संकट गहरा गया है. ऐसी आशंका है कि अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार कभी भी जा सकती है. इसकी वजह यह है कि उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का खेमा अशोक गहलोत से नाराज बताया जा रहा है. सचिन पायलट के विधायक सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं. हालांकि गहलोत ने ताल ठोक कर कहा है कि उनकी सरकार स्थिर है, जिसके बाहर जाना है जाए. गहलोत अगर ऐसा दावा कर रहे हैं तो इसके पीछे उनकी सियासी सूझ-बूझ जिम्मेदार है जिसे उन्होंने दशकों से आजमाया है.

Political Crisis Deepens In Rajasthan Government May Fall :

जमीनी नेताओं में शुमार
राजस्थान की राजनीति में जमीनी स्तर से शीर्ष पर पहुंचने वाले नेताओं में यदि किसी का नाम सबसे आगे आता है तो वो अशोक गहलोत हैं. सूबे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का परिवार माली समाज से आता है. इनका परिवार किसी जमाने में जादूगरी का करतब दिखाता था. गहलोत ने राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में भरपूर मदद की है. गुजरात के प्रभारी के तौर पर उन्होंने वहां की युवा तिकड़ी हार्दिक-अल्पेश-जिग्नेश को कांग्रेस के साथ खड़ाकर पार्टी को जीत की दहलीज पर ला खड़ा किया था और आज की तारीख में अशोक गहलोत पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीब हैं.

इंदिरा के करीबी गहलोत
अशोक गहलोत को 70 के दशक में कांग्रेस में शामिल होने का मौका मिला था, जब पू्र्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय पार्टी में संजय गांधी की चलती थी. जब संजय गांधी के करीबियों ने उन्हें अशोक गहलोत के बारे में बताया तो उन्होंने गहलोत को राजस्थान में पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई का अध्यक्ष बनाया.

कुछ लोगों का मानना है कि अशोक गहलोत पर सबसे पहले स्वयं इंदिरा गांधी की नजर पड़ी थी. जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में विद्रोह के बाद पूर्वोत्तर में शरणार्थी संकट खड़ा हो गया था. गहलोत की उम्र उस वक्त 20 साल थी और इंदिरा ने उन्हें राजनीति में आने का न्योता दिया. जिसके बाद गहलोत ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के इंदौर सम्मेलन में हिस्सा लिया और यहीं उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई.

गहलोत की सादगी
अशोक गहलोत की सरलता और सादगी उन्हें राजनीति में काफी ऊपर ले गई. एक समय था जब दिल्ली के बड़े नेता अहमद पटेल और गुलाम नबी आजाद के सामने गहलोत को जगह नहीं मिलती थी और आज वे इनके बराबरी में खड़े हैं. अपने स्वभाव और साधारण पृष्ठभूमि के अनुरूप अशोक गहलोत राजस्थान में लो प्रोफाइल रहते हुए काम करते रहे. लेकिन संजय गांधी की विमान हादसे में मौत के बाद जब पार्टी में राजीव गांधी को अहम रोल मिला, तब उन्होंने गहलोत के नाम की सिफारिश इंदिरा गांधी की कैबिनेट में राज्यमंत्री के तौर पर की. इस दौरान राजस्थान में कांग्रेस के दो बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और शिवचरण माथुर का बोलबाला था. लेकिन गहलोत को राजीव गांधी का भरोसा हासिल था.

नई दिल्ली: राजस्थान में सियासी संकट गहरा गया है. ऐसी आशंका है कि अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार कभी भी जा सकती है. इसकी वजह यह है कि उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का खेमा अशोक गहलोत से नाराज बताया जा रहा है. सचिन पायलट के विधायक सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं. हालांकि गहलोत ने ताल ठोक कर कहा है कि उनकी सरकार स्थिर है, जिसके बाहर जाना है जाए. गहलोत अगर ऐसा दावा कर रहे हैं तो इसके पीछे उनकी सियासी सूझ-बूझ जिम्मेदार है जिसे उन्होंने दशकों से आजमाया है. जमीनी नेताओं में शुमार राजस्थान की राजनीति में जमीनी स्तर से शीर्ष पर पहुंचने वाले नेताओं में यदि किसी का नाम सबसे आगे आता है तो वो अशोक गहलोत हैं. सूबे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का परिवार माली समाज से आता है. इनका परिवार किसी जमाने में जादूगरी का करतब दिखाता था. गहलोत ने राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में भरपूर मदद की है. गुजरात के प्रभारी के तौर पर उन्होंने वहां की युवा तिकड़ी हार्दिक-अल्पेश-जिग्नेश को कांग्रेस के साथ खड़ाकर पार्टी को जीत की दहलीज पर ला खड़ा किया था और आज की तारीख में अशोक गहलोत पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीब हैं. इंदिरा के करीबी गहलोत अशोक गहलोत को 70 के दशक में कांग्रेस में शामिल होने का मौका मिला था, जब पू्र्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय पार्टी में संजय गांधी की चलती थी. जब संजय गांधी के करीबियों ने उन्हें अशोक गहलोत के बारे में बताया तो उन्होंने गहलोत को राजस्थान में पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई का अध्यक्ष बनाया. कुछ लोगों का मानना है कि अशोक गहलोत पर सबसे पहले स्वयं इंदिरा गांधी की नजर पड़ी थी. जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में विद्रोह के बाद पूर्वोत्तर में शरणार्थी संकट खड़ा हो गया था. गहलोत की उम्र उस वक्त 20 साल थी और इंदिरा ने उन्हें राजनीति में आने का न्योता दिया. जिसके बाद गहलोत ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के इंदौर सम्मेलन में हिस्सा लिया और यहीं उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई. गहलोत की सादगी अशोक गहलोत की सरलता और सादगी उन्हें राजनीति में काफी ऊपर ले गई. एक समय था जब दिल्ली के बड़े नेता अहमद पटेल और गुलाम नबी आजाद के सामने गहलोत को जगह नहीं मिलती थी और आज वे इनके बराबरी में खड़े हैं. अपने स्वभाव और साधारण पृष्ठभूमि के अनुरूप अशोक गहलोत राजस्थान में लो प्रोफाइल रहते हुए काम करते रहे. लेकिन संजय गांधी की विमान हादसे में मौत के बाद जब पार्टी में राजीव गांधी को अहम रोल मिला, तब उन्होंने गहलोत के नाम की सिफारिश इंदिरा गांधी की कैबिनेट में राज्यमंत्री के तौर पर की. इस दौरान राजस्थान में कांग्रेस के दो बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और शिवचरण माथुर का बोलबाला था. लेकिन गहलोत को राजीव गांधी का भरोसा हासिल था.