नोटबंदी से बर्बाद हुए किसान और कोल्ड मालिक, लाखों टन आलू फेंकने को मजबूर

कानपुर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबन्दी के फैसले ने यूपी की आलू बेल्ट कहलाने वाले करीब 5 जिलों में कोल्ड स्टोरेज मालिकों और किसानों के सामने बर्बादी का कारण बनकर खड़ी हो गई है। नोटबंदी के बाद 22 दिन बीत जाने के बाद भी बाजार में न बदले हालातों ने इस ​इलाके के किसानों और कोल्ड मालिकों को भरोसा हो चला है कि ये सीजन उन्हें घाटा देकर जाने वाला है। दीवाली तक आलू की मांग और अच्छी कीमत के चलते किसान कोल्ड में रखे अपने जिस आलू को सोना समझ रहा था वह अब उसके लिए मिट्टी भी नहीं बचा है। कोल्ड मालिकों को भी इस बार अच्छी कमाई का अंदाजा था, लेकिन अब कोल्ड मालिकों को अपनी जेब से मजदूरी देकर कोल्ड खाली करवाने पड़ रहे हैं।

यूपी में कानपुर से शुरू होकर, कन्नौज, फर्रुखाबाद, मैनपुरी और इटावा तक जाने वाली आलू बेल्ट का किसान नोटबंदी की दोहरी मार झेल रहा है। दीवाली तक किसानों को कोल्ड में रखे अपने आलू की कीमत 800 से 900 रुपए प्रति ​कुंटल तक मिल रही थी। जिसमें से अपनी लागत और कोल्ड का भाड़ा चुकाने के बाद किसान को करीब 300 रुपए प्रति कुंटल का मुनाफा हो रहा था। इसके साथ ही किसान को उम्मीद थी कि जब तक ​उसका पुराना आलू बिक्री पूरे होते ही उसका नया आलू बेंचने के लिए तैयार हो जाएगा। लेकिन 8 नंवबर की रात 12 बजे से लागू हुई 500 और 1000 रुपए के नोटों की बंदी ने उनके तमाम सपनों को तोड़कर रख दिया है।

नोटबंदी के बाद से किसानों की स्थिति ऐसी है कि उनका पुराना आलू कोल्ड में पड़ा है तो नया आलू बिक्री के लिए तैयार हो चुका है। जिन किसानों का नया आलू बिक्री के लिए बाजार में पहुंचने लगा है उन्हें उम्मीद से तिहाई कीमत तक नसीब नहीं हो रही है। मंड़ियों में गिने चुने आड़ती हैं जो नई फसल को बनारस मंड़ी भेजने पर 20 दिन के बाद किसान को पैसा देने की बात कह रहे हैं। कुछ आड़ती बाहर भेजने के बजाय स्थानीय बाजार में भी आलू खपाने में लगे हैं, लेकिन मांग के अनुपात में आवग ज्यादा होने के चलते किसान के हिस्से नुकसान ही आ रहा है।

कन्नौज के एक किसान राम सेवक बताते हैं कि दीवाली से 20 दिन पहले पांच बीघा अगैती कहलाने वाली आलू की फसल बोई थी। उम्मीद थी कि पांच बीघा फसल कुछ नहीं हो 25 से 30 हजार रूपए का मुनाफा देकर जाएगी और उसी खेत में गेंहू की फसल पैदा कर लेंगे। नोटबंदी के बाद हालात ऐसे हैं कि पानी और खाद की लागत तक हाथ आती नजर नहीं आ रही। गेंहू ​की फसल बोने के लिए जुताई की समस्या है। ट्यूबवैल वाले को पानी की उधारी चुकानी और मजदूरों की मजदूरी अभी बाकी है। गेंहू की फसल बोने से पहले खेत की जुताई तक के लिए हिम्मत नहीं जुट पा रही है।

रामसेवक कहते हैं कि बाजार में नया आलू आने के डेढ़ महीने बाद तक नए आलू की कीमत 500 रूपया प्रति कुंटल तक मिलती थी। जबकि अगैती फसल मरी हालत में 1200 रुपया प्रति कुंटल छोड़ती थी। अगैती फसल की पैदावार भी कम रहती है लेकिन ऊंची कीमत मिल गई तो समझो किसान की साल भर की कमाई हो जाती थी। इस बार आलू की फुटकर कीमत अभी से 600 से 700 रुपया हो गई है। उम्मीद थी कि कुछ ना कुछ बन पड़ेगा लेकिन होता नहीं दिख रहा।

ऐसी ही हालत कोल्ड मालिकों की है। एक कोल्ड स्टोरेज में मैनेजर का काम देखने वाले राजेन्द्र कुमार बताते हैं कि किसान के नुकसान ने कोल्ड मालिकों की कमर भी तोड़ दी है। उनके मुताबिक कोल्ड स्टोरेज को प्रति कुंटल 160 रूपए का किराया मिलता है, लेकिन कोल्ड में पड़े आलू का कीमत 200 से 250 रुपए प्रति कुंटल लग रही है। वह आगे कहते हैं कि कोल्ड के किराए के बाद किसान को आलू मंडी तक ले जाने में 150 रुपए प्रति कुंटल बोरे, आलू की सफाई और ढुलाई के रूप में खर्च करने पड़ते हैं, कोल्ड में भी आलू कुछ मात्रा में सड़ जाता है। ऐसी परिस्थिति में किसान कोल्ड तक न आने में ही अपनी भलाई समझ रहा है।

राजेन्द्र कहते हैं कि किसान की तरह ही कोल्ड मालिकों पर दोहरी मार पड़ रही है। इलाके में कोल्ड स्टोरेजों की बढ़ती संख्या के कारण कोल्ड मालिक भी किसानों को अपने कोल्ड में आलू डालने के लिए तरह तरह के प्रलोभन देते हैं। कोई कोल्ड मालिक किसान को आलू की कीमत का कुछ हिस्सा एडवांस में दे देते हैं, तो कुछ सीधे बोरे और ढुलाई का भुगतान अपनी जेब से करते हैं ताकि किसान अपना आलू उनके कोल्ड में ही लेकर पहुंचे। ​ये एडवांस आलू की बिक्री के समय वापस आता है। अब किसान के न आने से एडवांस और भाड़ा तो मरेगा ही साथ में कोल्ड में पड़े आलू को बाहर निकालने के लिए मजदूरी अलग से चुकानी पड़ेगी।

यूपी के आलू किसान के लिए पैदा हुई इस समस्या का मुख्य कारण सीजन के समय लागू हुई नोटबंदी है। जिस वजह से बाजार में किसी के पास भी नगदी नहीं है। 22 दिन बीत जाने के बाद भी नोटबंदी लागू करने वाली सरकार के इंतजामात अभी तक शहरों तक ही नाकाफी हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसान किसी राहत की उम्मीद कैसे पाल सकते हैं।

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