सरकारी प्रोजेक्ट को फेल करने गारंटी है पीपीपी मॉडल

लखनऊ। वर्ष 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मूलभूत ढांचे को तेजी से विकसित करने के लिए बनी  योजनाओं में निजी क्षेत्र की कंपनियों की साझेदारी से बढ़ाने की नियत से पीपीपी मॉडल को परिभाषित किया था। पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जिसे सरकारी भाषा में 3पी भी कहा जाता है। 3पी के तहत चलाई जाने वाली योजनाओं में आड़े आने वाली समस्याओं को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन सरकार ने कानूनों में कई बदलाव भी किए थे। इसके बावजूद भारत जैसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले देश में पीपीपी मॉडल व्यवहारिक नहीं बन पाया। केवल उत्तर प्रदेश की ही बात की जाए तो पीपीपी मॉडल के तहत 2008 में शुरू किए गए करीब 18 सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के अधिकांश प्रोजेक्ट्स अधूरे पड़े हैं।

क्या है पीपीपी मॉडल —

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सड़क, बंदरगाह और शहरी विकास से जुड़ी परियोजनाओं को सरकार और निजी कंपनियों की साझेदारी से पूरा करना और संचालित करने की व्यवस्था को पीपीपी मॉडल कहा जाता है। पीपीपी मॉडल के तहत शुरू किए जाने प्रोजेक्ट्स 10 से लेकर 30 साल की योजना के तहत शुरू किए जाते हैं। जिनमें प्रोजेक्ट को पूरा करने से लेकर परियोजना के संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनी (जिसे बेंडर कहते हैं) की रहती है। सरकार और बेंडर के बीच एक अनुबंध होता है, जिसमें प्रोजेक्ट को लेकर सरकार और निजी कंपनी के दायित्व कानूनी रूप से परिभाषित किए जाते हैं।

पीपीपी मॉडल के तहत शुरू हुए प्रोजेक्टों का करीब से अध्ययन करने पर सामने आया कि एक सरकार जिस प्रोजेक्ट के लिए 10 से 30 साल की योजना तैयार करती है, उसे अगली सरकार रोक देती है। पूरे प्रोजेक्ट की उपयोगिता और प्रोजेक्ट में शामिल होने वाली निजी कंपनी की नियत पर सवाल उठाकर नई सरकार अनुबंध की शर्तों को पूरा करने से पीछे हट जाती है। सरकार की मदद के बिना प्रोजेक्ट अधर में लटक जाते हैं और निजी कंपनी को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। अब पीपीपी के तहत शुरू हुए सैकड़ों ऐसे प्रोजेक्ट सामने आ चुके हैं जिन्हें राजनीतिक शत्रुता की बेदी पर चढ़ा दिया गया।

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आमतौर पर पीपीपी मॉडल के तहत किसी भी प्रोजेक्ट को ​10 से 15 साल की योजना के साथ तैयार किया जाता है। जिसमें सरकार प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत और प्रोजेक्ट को अगले 10 से 15 सालों तक चलाने में होने वाले रख रखाव के खर्च को जोड़ती है। उदाहरण के तौर पर सरकार पीपीपी मॉडल के तहत सरकार अपने जिस प्रोजेक्ट की लागत 300 करोड़ बताती है, जिसमें 100 करोड़ की लागत प्रोजेक्ट पूरा करने में लगती है जबकि 200 करोड़ का बजट रख रखाव पर आने वाले 10 से 15 सालों के लिए रिजर्व रखा जाता है।

इस 100 करोड़ की मूल लागत में सरकार का निवेश मात्र 60 प्रतिशत होता है। जबकि शेष 40 प्रतिशत बेंडर को निवेश करना होता है। बेंडर को अपना निवेश निकालने के लिए योजना के तय अवधि यानी 10 से 15 साल तक प्रोजेक्ट को सफलता पूर्वक संचालित करना होता है। जिसके लिए उसे रख रखाव के मद में होने वाले खर्चों के साथ उसके निवेश की राशि किश्तों में लौटाई जाती है।

इस वजह से असफल है पीपीपी मॉडल —

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पीपीपी मॉडल के अनुबंध करने वाली कंपनियां जब किसी प्रोजेक्ट को शुरू करतीं हैं तो उन्हें अपनी हिस्सेदारी के लिए बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है। सरकार की गारंटी पर बैंक भी आसानी से लोन पास कर देतीं हैं। प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और साल भर बाद सरकार बदल जाती है। जिसके बाद नई सरकार प्रोजेक्ट के दी जाने वाली सरकारी ग्रांट पर रोक लगा देती है। ऐसे में अनुबंध करने वाली कंपनी को प्रोजेक्ट पूरा करने में देर होती है और दूसरी ओर उसके सिर पर बैंक के कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है। नई सरकार पुरानी सरकार की सोच पर सवाल खड़े कर पूरे प्रोजेक्ट पर दस तरह की जांच बैठा देती है और पीपीपी मॉडल की हवा निकल जाती है। इसमें सरकारी ग्रांट की बर्बादी के साथ—साथ कंपनी भी बर्बाद होती है। मामला अदालतों तक जाता है जहां दो से तीन साल तक चलने वाली प्रक्रिया में भी शोषण निजी कंपनी का ही होता है।

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