अदालत ने माना निजता है मौलिक अधिकार

अदालत ने माना निजता है मौलिक अधिकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों वाली संविधान विशेष बेंच ने गुरुवार को एक एतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजता यानी प्राइवेसी को मौलिक अधिकार माना है। संविधान की धारा 21 के तहत निजता को जीने के अधिकार का हिस्सा माना गया है। आजाद भारत में यह तीसरा मामला था जिसमें सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने निजता के अधिकार को लेकर सुनवाई कर फैसला सुनाया है। इससे पहले 1954 और 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार मानने से इंकार कर दिया था।

लंबे समय से निजता के अधिकार को लेकर चल रही बहस को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक नया मोड़ दे दिया है। नौ जजों की बेंच ने माना है कि हर नागरिक का अधिकार है कि वह स्वयं सुनिश्चित करे उसकी निजी जिन्दगी में किसी तीसरे आदमी की हस्तक्षेप किस हद तक हो सकता है। अगर वह किसी संस्था के नियम या शर्तों को स्वीकार करते हुए अपनी जानकारियां साझा करता है तो उन संस्थाओं को उसकी निजी जानकारियों को पूरी तरह से गुप्त रखना चाहिए।

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अदालत ने टेली मार्केटिंग का हवाला देते हुए कहा कि उनके मोबाइल पर रोज कॉल आती है कभी बीमा पॉलिसी बेंची जाती है तो कभी फ्लैट यह उनकी निजता के साथ खिलवाड़ है। पता नहीं कब और कहां से आपकी निजी जानकारी को किसी दूसरी संस्था से साझा कर दिया जाएगा, यह आपकी निजता का हनन है। हर नागरिक को अधिकार है कि वह अपनी निजी जानकारी किसके साथ साझा करना चाहता है और किसके साथ नहीं। अगर वह किसी संस्था के साथ उसकी शर्तों पर अपनी निजी जानकारी साझा कर रहा है तो यह उस संस्था की जिम्मेदारी होगी कि उस व्यक्ति की निजता को भंग न किया जाए।

निजता में होगी शर्त —

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अदालत ने निजता को मौलिक अधिकार करार देते हुए कहा ​है किन यह एक सहशर्त मौलिक अधिकार है। जिसके लिए सीमा निर्धारित करने की जरूरत है। हमारी निजता का दायरा कितना होगा इसे परिभाषित करने भी उतना ही जरूरी है जितना इसकों किसी अन्य कानून को।

आधार पर नहीं की कोई टिप्पणी—

तमाम सरकारी मूल सुविधाओं के लिए जरूरी बन चुके आधार कार्ड को लेकर अदालत ने कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत आधार कार्ड को निजता से जोड़कर भविष्य में कुछ दिशा निर्देश जारी कर केन्द्र सरकार को आधार कानून में कुछ संशोधन करने के निर्देश दे सकती है।

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