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पूर्वांचल में चुनावी बयार…..

By टीम पर्दाफाश 
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लखनऊ। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है जहां संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। सर्वदा से ही उत्तर प्रदेश भारतीय राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है, इस प्रदेश के राजनीतिक रसूख का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में अब तक सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री यहीं से हुए हैं। अगर बात उत्तर प्रदेश के हृदय स्थल की होती है तो पूर्वांचल का नाम सबसे पहले आता है, क्योंकि भारतीय राजनीति की बयार कहीं न कहीं पूर्वांचल से शुरू होकर ही दिल्ली तक जाती है।

हाल फिलहाल में प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक पूर्वांचल ने अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। उदाहरण के तौर पर देखे तो 2014 का लोकसभा का आम चुनाव हो याद 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव, राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो वाराणसी लोकसभा सीट को नरेंद्र मोदी द्वारा चुना जाना है एक सटीक उदाहरण, इसी संसदीय क्षेत्र की वजह से पूरा पूर्वांचल कमलमय हो गया था जिसने पूरे बिहार को भी प्रभावित किया था।

इस बार 2019 के लोकसभा के आम चुनाव को नजदीक से देखें तो पता चलता है कि यह चुनाव बसपा सुप्रीमो मायावती जी के लिए सबसे खास है, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उनका खाता भी नहीं खुल पाया था कि अपने धुर विरोधी समाजवादी पार्टी के साथ महागठबंधन में उन्हें आना पड़ा, दूसरी तरफ बीजेपी अपना दल प्रमुख अनुप्रिया पटेल के साथ गठबंधन करके कुर्मी मत और संजय निषाद के साथ बात करके प्रदेश के 14 प्रतिशत निषाद मतो पर अपनी नज़र गड़ाए हुए हैं।

वहीं कांग्रेस भी अपने वोट बैंक में इज़ाफ़ा करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। ज्ञात रहे कि, पूर्वांचल मे तकरीबन 23 लोकसभा की सीटें हैं। ग़ौर करें तो, सत्ता के इस कुरुक्षेत्र में पूर्वांचल को साधने के लिए सभी दलों ने अपने अपने मोहरे बिछाने शुरु कर दिए हैं। यहां वाराणसी, भदोही, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, गोरखपुर सहित भी सीटों पर कमल रथ को रोकने के लिए सभी दलों द्वारा तमाम राजनीतिक हथकंडे अपनाएं जाएंगे।

इधर, कांग्रेस की प्रियंका गांधी को पूर्वांचल सहित प्रदेश के 42 सीटों का जिम्मा देकर पॉलिटिकल थ्रिलर पैदा कर दिया है। प्रियंका गांधी द्वारा इलाहाबाद से वाराणसी तक तीन दिवसीय नौका यात्रा की शुरुवात कहीं ना कहीं बीजेपी और महागठबंधन को परेशान करके रख दिया है। पॉलिटिकल पंडितों के अनुसार प्रियंका गांधी का सक्रिय होना पूर्वांचल में कभी कांग्रेस के बेस वोटर्स ब्राह्मण, मुस्लिम,और दलितों को कांग्रेस की तरफ मोड़ना भी है।

यहां ध्यान देने कि बात है कि, पिछली लोकसभा चुनाव में,बीजेपी की जीत पक्की करने के लिए मोदी ने पूर्वांचल में चुनावी रैलियों पर खासा फोकस किया था। उन्होंने बनारस, चंदौली इत्यादि कई जगहों पर अपनी रैलियों के द्वारा बीजेपी के पक्ष में माहौल बना दिया था। मौजूदा के चुनाव के मद्देनजर भी मोदी ने गाजीपुर से रैली की शुरुआत कर दी है। उनका मुख्य फोकस पूर्वांचल के पिछड़े मतदाताओं को बीजेपी की तरफ मोड़ना है।

उधर, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का आजमगढ़ की सीट से लड़ना पूर्वांचल के यादव,मुस्लिम, और दलितों को महागठबधन के पक्ष में करना है, हालांकि इसकी संजीवनी उन्हें बीएसपी गठबंधन से मिल रही है। पूर्वांचल में मुद्दों की कमी नहीं है। पंडित कमला पति त्रिपाठी बनारस से, पंडित श्यामधर शर्मा भदोही से, वीर बहदुर सिंह गोरखपुर से, कल्पनाथ राय मऊ से, यहां तक कि आज के सीएम योगी आदित्यनाथ इत्यादि एक से बढ़कर एक,पॉलिटिकल गेमचेंजर इसी पवित्र धरती से हुए है।

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी भी इसी माटी के कड़ थे। बात मुद्दों की होती है तो ये ऐसे नाम थे जिन्होंने पूर्वांचल के विकास के लिए बहुत काम किए। आज दुख होता है कि इन कद्दावर पॉलिटिशियन की जगह भरने वाले बड़े मुश्किल से मिलेंगे। आज लगभग सभी पार्टियों में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की दखलंदाजी देखने को मिल जाया करती है।

लोकतन्त्र में चुनावी मेले तो आते जाते रहेंगे,लेकिन आम जनता की मुद्दे आज भी वही है और आगे भी रहेंगे क्योंकि मुद्दे समाप्त हो जायेंगे तो फिर इस मेले की क्या ज़रूरत होगी। फिर कौन आएगा इनके लोकलुभावन घोषणा पत्रों को पढ़ने, इनके लॉलीपॉप भाषणों को सुनने। जब चुनावी बयार शांत हो जाएगी, वादो के धूल चले जायेंगे क्योंकि चुनावी मेला समाप्त हो चुका होगा। सारे खिलाड़ी अपने अपने घर पर होंगे कुछ जीत कि खुशी डूबे होंगे तो कुछ अगली चुनावी मेले की तैयारी में होंगे।

अफसोस इस बात का होगा की इस पवित्र पूर्वांचल निवासी एक बार फिर ठगे जायेंगे। अब इन भोलेभाले बेचारो को कौन समझाए कि बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, कर्ज़ा, सूदखोरी, बीमारी, कुपोषण, पानी, बिजली, मकान इत्यादि जैसे मुद्दों को हल करना, इन राजनीतिक कठमुल्लों के द्वारा नहीं हो सकता क्योंकि ये गरीबों की तकदीर बन चुकी है।

रिपोर्ट- रोशन मिश्रा, चंदौली (वाराणसी)

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