स्याही की खबर से छोटी हुई बैंकों के बाहर लगी कतारें

Queues Out Side Banks Goes Shorter After News Of Ink Putting

लखनऊ। हमारा देश गजब है। यहां समस्या को बड़ा बनाने का कारोबार बड़ी तेजी से पनपता है और डंडा चलते ही कारोबारी गायब हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला बुधवार को बैंकों के बाहर लगने वाली नोट बदलवाने वालों की लाइनें देखकर। पिछले छह दिनों से बैंकों के बाहर नोट बदलने वालों की लाइनें बढ़ती नजर आ रहीं थीं। इस बीच केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने नोट बदलने वालों के स्याही लगाने का निर्णय लिया तो सातवें दिन बैकों के बाहर तक दिखने वाली भीड़ बैंकों के भीतर तक नजर आईं तो कहीं लाइनें आधी रह गईं।



सबसे मजेदार हालात तो लखनऊ में देखने को मिले जहां बुधवार को बैंकों में स्याही तो नहीं पहुंची लेकिन बार—बार नोट बदलवाने पहुंचने वाले लोगों के दिलों में स्याही का डर जरूर पहुंच गया। बैंक कर्मचारियों की माने तो कई लोगों ने पुराने नोट बदलना अपना धंधा बना लिया था। विशेष तौर पर शहरों में जहां कुछ लोगों कई—कई बार बैंकें बदलकर नोट बदल डाले तो कुछ लोगों का नंबर ही नहीं आया। जिन्हें तकनीकि रूप से ट्रैक करना भी कठिन है।




यह एक बहुत बड़ी हकीकत है कि कुछ लोग या यूं कहे कि बेरोजगारों ने अपने पहचान पत्रों पर दर्जनों बार करेंसी बदली है। एकबार लाइन में लग ऐसे लोग 400 से 500 रूपए तक कमा रहे थे। ये आंखों देखी बात है कि बीते शुक्रवार को बैंक की लाइन में लगा एक व्यक्ति, जिसे कुछ ज्यादा पैसों की जरूरत थी, को मात्र 4000 रूपए बदले जाने की सीमा के कारण एक लड़के से 1800 रूपए लेकर 2000 रूपए चुकाने पड़े। यह सौदा पहले 2000 के बदले 1600 की मांग के साथ शुरू हुआ था। जो बाद में 2000 के बादले 1800 रूपए तक पूरा हुआ।

जब अपने 1000 रूपए का नोट 900 रूपए में चलाने वाले इन महाशय से हमने कारण पूछा तो वह कहने लगे कि घर में दो महीने बाद शादी है। मकान में कुछ काम लगा हुआ है। मजदूरों को दो तीन दिन की मजदूरी देनी ही है। पहले दिन सोचा था दो दिन में भीड़ कुछ कम हो जाएगी, लेकिन यहां लाइनें लंबी होेती जा रहीं हैं। अपने खर्चे चलाने के लिए तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन मजदूर को पैसे देने के लिए यहां तक आना पड़ा।




वास्तविकता में आर्थिक रूप से यह समय हर देशवासी के लिए कठिन है। सरकार का फैसला है तो उसे मानना एक मजबूरी है तो दूसरी ओर देश का हित देखते हुए जरूरी भी। देश की आबादी को देखते हुए जल्द किसी प्रकार की सहूलियत के मिलने की बात करना तो गलत होगा, लेकिन इतना जरूर है कि अपनी जरूरतों को कुछ दिन के लिए सीमित कर हम अपना योगदान देशहित के लिए दे सकते हैं। बार—बार नोट बदलने वालों को भी समझना चाहिए कि वे लोग अपने फायदे के लिए उन लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं जिनके लिए लाइन में लगना मजबूरी है।

लखनऊ। हमारा देश गजब है। यहां समस्या को बड़ा बनाने का कारोबार बड़ी तेजी से पनपता है और डंडा चलते ही कारोबारी गायब हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला बुधवार को बैंकों के बाहर लगने वाली नोट बदलवाने वालों की लाइनें देखकर। पिछले छह दिनों से बैंकों के बाहर नोट बदलने वालों की लाइनें बढ़ती नजर आ रहीं थीं। इस बीच केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने नोट बदलने वालों के स्याही लगाने का निर्णय लिया तो सातवें दिन…