आज है नोबल पुरस्कार विजेता और दो देशों का राष्ट्रगान लिखने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि

आज है नोबल पुरस्कार विजेता और दो देशों का राष्ट्रगान लिखने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि
आज है नोबल पुरस्कार विजेता और दो देशों का राष्ट्रगान लिखने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि

नई दिल्ली। उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की आज पुण्यतिथि है। टैगोर को लेखन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया गया था। आज ही के दिन 7 अगस्त 1941 को उनकी मौत हो गई थी। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। आज हम आपको उनकी पुण्यतिथि के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें….

Rabindranath Tagore Death Anniversary :

रवींद्रनाथ टैगोर को करीबी से जानने वाले बताते हैं कि उनको बचपन से ही कविता, छन्द और भाषा को समझने की अद्भुत प्रतिभा थी। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और सन् 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा भी प्रकाशित हो गई थी। उनके लेखन में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने अपने अन्दर समेट लिए थे। पिता के ब्रह्म-समाजी के होने के कारण वे भी ब्रह्म-समाजी थे और अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होंने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया।

1873 में टैगोर अमृतसर में अपने एक महीने के प्रवास के दौरान, वह सुप्रभात गुरबानी और नानक बनी से बहुत प्रभावित हुए थे, इनको स्वर्ण मंदिर में गाया जाता था जिसके लिए रवींद्रनाथ अपने पिता के साथ जाया करते थे। उन्होंने इतिहास, भाषा विज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ी कई किताबें लिखी थी। अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी संक्षिप्त बातचीत, “वास्तविकता की प्रकृति पर नोट”, एक परिशिष्ट के रूप में शामिल किया गया है। 150 वें जन्मदिन के मौके पर उनके कार्यों का एक संकलन वर्तमान में प्रकाशित किया गया। इसमें प्रत्येक कार्य के सभी संस्करण शामिल हैं और लगभग अस्सी संस्करण है।

1913 में मिला नोबेल पुरस्कार

उनकी काव्य रचना गीतांजलि के लिए उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। सन् 1915 में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया जिसे उन्होंने सन् 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में वापस कर दिया था।

नई दिल्ली। उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की आज पुण्यतिथि है। टैगोर को लेखन के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया गया था। आज ही के दिन 7 अगस्त 1941 को उनकी मौत हो गई थी। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। आज हम आपको उनकी पुण्यतिथि के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें.... रवींद्रनाथ टैगोर को करीबी से जानने वाले बताते हैं कि उनको बचपन से ही कविता, छन्द और भाषा को समझने की अद्भुत प्रतिभा थी। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और सन् 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा भी प्रकाशित हो गई थी। उनके लेखन में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने अपने अन्दर समेट लिए थे। पिता के ब्रह्म-समाजी के होने के कारण वे भी ब्रह्म-समाजी थे और अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होंने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया। 1873 में टैगोर अमृतसर में अपने एक महीने के प्रवास के दौरान, वह सुप्रभात गुरबानी और नानक बनी से बहुत प्रभावित हुए थे, इनको स्वर्ण मंदिर में गाया जाता था जिसके लिए रवींद्रनाथ अपने पिता के साथ जाया करते थे। उन्होंने इतिहास, भाषा विज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ी कई किताबें लिखी थी। अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी संक्षिप्त बातचीत, "वास्तविकता की प्रकृति पर नोट", एक परिशिष्ट के रूप में शामिल किया गया है। 150 वें जन्मदिन के मौके पर उनके कार्यों का एक संकलन वर्तमान में प्रकाशित किया गया। इसमें प्रत्येक कार्य के सभी संस्करण शामिल हैं और लगभग अस्सी संस्करण है। 1913 में मिला नोबेल पुरस्कार उनकी काव्य रचना गीतांजलि के लिए उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। सन् 1915 में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया जिसे उन्होंने सन् 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में वापस कर दिया था।