रागिनी के पिता का दर्द: भगवान किसी भी बाप को न दिखाये ऐसा दिन

बलिया। घर की जिस ‘लाड़ली’ ने कभी आंगन को ​अपनी किलकारियों से गुलजार किया था, जिसकी शरारतों के निशान घर की दीवारों पर आज भी मौजूद हों, जिसकी कभी न खत्म होने वाली बातों की आदत घर के हर सदस्य को चुकी हो, वही लाड़ली अचानक से दुनिया से दूर चली जाए, तो परिवार पर क्या गुजरेती है इस बात का अंदाजा रागिनी के परिजनों को देख लगाया जा सकता है। लोग लाख सांत्वना दे, संवेदना व्यक्त करे लेकिन परिवार के लोगों का दिल मानों वास्तविकता को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा है। बलिया के बजहां गाँव में सरेराह दरिंदों का शिकार हुई रागिनी की मौत ने जीतेन्द्र दूबे के परिवार से उसकी लाड़ली को छीन लिया है। जितेन्द्र की बंद आंखों ने रागिनी के लिए जो सपने देखे थे, वे सब मानो उसकी मौत के साथ जख्म बनकर उसके जहन में दब चुके हैं।

रागिनी के खून से लथपथ शव को अपने हाथोंं से उठाने वाले जितेन्द्र को सरकार और सिस्टम के दावे जाया नजर आ रहे हैं। उसके दरवाजे पर पहुंचने वाले सरकार और सिस्टम के नुमांइदे भले ही इंसाफ की बात कर रहे हों लेकिन उसके अंदर का पिता जानता है कि इन सब से उसके घर की खुशी वापस नहीं लौटेगी।

रागिनी की मौत से दुखी जितेन्द्र अब एक ही बात कह रहे हैं कि भगवान किसी को ऐसा दिन न दिखाए। पाल-पोस कर बड़ी की गई बच्ची ने इन्ही हाथों में दम तोड़ दिया। न कुछ कह पाई और न ही हम उसे कुछ बता पाए। सुबह जिस चेहरे को देख कर जागता था उसी चेहरे को खून में लथपथ देखना पड़ा। जाने वो कैसी सुबह थी जिसने हमारा सब कुछ छीन लिया। लोगों की बातों का कोई मतलब समझ में नहीं आता। कोई दिलासा दिल को तसल्ली नहीं देता। समझ नहीं आता क्या करें कि चैन आ जाए। आँख बंद करो तो रागिनी का चेहरा सामने आ जाता है और आंख खोलो तो सच। इस पीड़ा का इलाज किसी के पास नहीं है। बार—बार यही सोचने लगता हूं कि मेरी बेटी ने कैसे उस दर्द को सहन किया होगा। उसके गले के घाव अपने गर्दन पर महसूस होते हैं।

जितेन्द्र इसके साथ ही सरकार से अपील करते हैं कि सरकार से बस एक ही बात कहना चाहते हैं कि किसी और पिता को यह दिन न देखना पड़े। पिता की पीड़ा को समझना शायद किसी के बस की बात नहीं। इस पीड़ा को किसी और को ना झेलना पड़े तो यह बड़ी बात होगी।