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सबरीमाला: 12 साल की बच्ची को भगवान अयप्पा के दर्शन करने से रोका गया

Sabarimala 12 Year Old Girl Stopped From Visiting Lord Ayyappa

सबरीमाला: केरल के भगवान अयप्पा मंदिर में 10 से 50 आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न देने का काफी दिनो से मामला चल रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में इसका फैसला आना था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच में ट्रान्सफर कर दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 साल की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश बन्द नही किया लेकिन केरल सरकार ने इस बार भी रोक लगा रखी है। केरल सरकार का कहना है कि मंदिर आंदोलन का अखाड़ा नहीं है और वह उन महिलाओं को प्रोत्साहित नहीं करेगी जो प्रचार के लिए आएंगी।

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इस समय सबरीमाला में भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए हज़ारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। दो महीने तक चलने वाली वार्षिक तीर्थयात्रा ‘मंडल-मकरविलक्कू’ का ये पहला सफ्ताह है। मंगलवार को लोग लाईन में लगे थे तभी पुलिस ने एक बच्ची को रोंक लिया। हालांकि बच्ची के घरवालों ने बच्ची की उम्र 10 साल ही बतायी लेकिन पुलिस वालो ने उसकी आईडी चेक की तो उसमें बच्ची की उम्र 12 साल थी।

बताया जाता है कि सबरीमाला मंदिर का अस्तित्व करीब 800 साल पुराना है। यही नही महिलाओं का प्रवेश पर विवाद भी लम्बे समय से है। कहा जाता है कि भगवान अयप्पा नित्य ब्रह्मचारी माने जाते हैं, जिसकी वजह से उनके मंदिर में ऐसी महिलाओं का आना मना है, जो मां बन सकती हैं। ऐसी महिलाओं की उम्र 10 से 50 साल निर्धारित की गयी है। माना गया कि इस उम्र की महिलाएं पीरियड्स होने की वजह से शुद्ध नहीं रह सकतीं और भगवान के पास बिना शुद्ध हुए नहीं आया जा सकता।

महिलाओं के प्रवेश के लिए सबसे पहली बार 1990 में याचिका दाखिल की गयी लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। 2006 में फिर मामला उछला जब मन्दिर के पुजारी ने कहा कि किसी महिला के प्रवेश की वजह से भगवान अयप्पा अपनी शक्तियां खो रहे हैं। इस दौरान कन्नड़ ऐक्ट्रेस जयमाला ने दावा किया कि 1986 में वह अपने ऐक्टर पति प्रभाकर के साथ सबरीमाला मंदिर के अंदर गई थीं और वहां धक्का लगने की वजह से गर्भगृह तक भी पहुंची थीं। इसके बाद जयमाला पर धार्मिक भावनाओं को आहात पंहुचाने का आरोप लग गया।

ये मामला कोर्ट में चलता रहा और 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कोर्ट के पिछले फैसले को खत्म करते हुए महिलाओं के हक में फैसला सुनाया। हलांकि जजों में भी थोड़ा मतभेद था लेकिन मन्दिर के अन्दर जाने के लिए अनुमति दे दी गयी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘हमारी संस्कृति में माता का आदरणीय स्थान है। यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है। उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है, जो स्वीकार्य नहीं है।’ उसके बाद जब 18 अक्टूबर 2018 को मंदिर के कपाट खुले, तो तमाम महिलाएं भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए पहुंचीं। लेकिन इसके बावजूद विरोध शुरू हो गया।

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