किसान आंदोलन के समर्थन में सपा ने राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के एक प्रतिनिधि मंडल ने गुरुवार को राज्यपाल राम नईक से मुलाकात कर देश भर में किसानों के साथ हो रहे उत्पीड़न के विरोध एवं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र हरियाणा, राजस्थान, आदि राज्यों में चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में ज्ञापन सौंपा है।




सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने बताया कि पार्टी के ज्ञापन में कहा गया है कि देश भर का किसान आंदोलित है। तमिलनाड़ु, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान अनेक राज्यों में किसान बदहाल हैं। मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर जो बर्बर अत्याचार हुआ है उसकी मिसाल नहीं। उत्तर प्रदेश का किसान भी अपनी अनदेखी से क्षुब्ध है। यही हाल अन्य प्रदेशों का भी है। किसान आंदोलन कभी भी विकराल रूप ले सकता है।

किसान आंदोलन का विस्फोट वस्तुतः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की किसान विरोधी नीतियों का परिणाम है। लोकसभा चुनाव में किसानों, गरीबों, नौजवानों को झूठे सपने दिखाए गए थे। तमाम वादे किए गए थे लेकिन एक भी वादा पूरा नहीं हुआ। दो करोड़ नौजवानों को रोजगार देने का वादा किया था जबकि पहले से नौकरी कर रहे तीन वर्ष में ही डेढ़ करोड़ नौजवानों को बेरोज़गार बना दिया हैं। सबसे ज्यादा दुःखी और क्षुब्ध किसान है। वह देश का अन्नदाता है लेकिन आज वह कर्जदार का अपमान झेल रहा है। 36 हजार किसान तीन वर्षों में आत्महत्या कर चुके हैं।

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चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा के सामान्य निर्वाचन के समय अपने भाषणों द्वारा प्रदेश के किसानों को कर्ज से मुक्त करने का वादा किया था। किसानों का पूरा कर्ज माफ करने के वादे के खिलाफ केवल सीमान्त व लघु कृषकों का एक लाख रूपया तक का कर्ज माफ किया जा रहा है। इसे कर्ज मांफी कहां से कहा जा सकता है। सरकार की इस प्रकार की दोहरी भ्रामक नीति से दुखी होकर हमीरपुर, कौशाम्बी, कानपुर नगर जनपदों में 4 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। आशंका है कि उत्तर प्रदेश का किसान कभी भी आन्दोलन करने को विवश हो सकता है।




सपा के ज्ञापन में कहा गया है कि देश के किसानों की चिंता करते हुए डा0 राममनोहर लोहिया ने उनकी समस्याओं को देशव्यापी स्तर पर उठाया था। चैधरी चरण सिंह जब केंद्र में वित्तमंत्री बने उन्होंने केंद्रीय बजट की 70 प्रतिशत राशि किसानों एवं कृषि की तरक्की के लिए निर्धारित की थी। उत्तर प्रदेश में जब सन् 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी सरकार रही कृषि एवं किसान के हित में बजट की 75 प्रतिशत धनराशि खर्च की गई। किसानों को कर्जमाफी, फसलबीमा, मुफ्त सिंचाई, किसान बीमा, समाजवादी पेंशन, की सुविधाओं के साथ उसकी आय बढ़ाने के लिए मंड़ी स्थलों का निर्माण, कामधेनु योजना तथा संपर्क मार्गों का निर्माण कराया गया। गांवों में 18 घंटे बिजली आपूर्ति की व्यवस्था की गई थी। अब 8 घंटे भी बिजली नहीं मिल रही है।




केंद्र और राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें काम कर रहीं हैं। परिणाम स्वरूप गांव-खेती-किसान उपेक्षित हैं। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी की आर्थिक नीतियां कारपोरेट घरानों की पक्षधर रही है और गरीब, किसान नौजवान के हितों से उनका कोई वास्ता नहीं रहा है। इसीलिए किसानों को राहत देने की जगह बड़े 50 पूंजी घरानों का डेढ़ लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया है और उनके संरक्षण की नीतियां बनाई जा रही है। कई बड़े कर्जदार बैंकों को धोखा देकर विदेश भाग गए है।




भाजपा सरकारें गरीबों और किसानों की आर्थिक हालत के सुधार में दिलचस्पी नहीं रखती है। किसानों की आय 2022 तक दुगनी करने का वादा भी हवा हवाई है, क्योंकि अब तक इसकी कोई रूपरेखा सामने नहीं आई है। भाजपा चाहती है किसान खुद ही खेती करना छोड़ दे। विडंबना है कि किसान के उत्पाद का लागत मूल्य खाद, बीज, कृषि उपकरणों के रूप में तो बढ़ता जा रहा है लेकिन उसकी वास्तविक आय में कोई वृद्धि नहीं हुई है। किसान इस तरह दोहरी मार का शिकार है। एक तो उनकी फसल का लागत मूल्य नहीं मिल रहा है और दूसरे वे कर्जदार होते जा रहे हैं। ऐसे में किसान आत्महत्या को विवश है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर भाजपा सरकारें सिर्फ किसानों के साथ छलावा कर रही हैं क्योंकि 94 प्रतिशत किसान तो बाजार के भरोसे रहते हैं।




ये रहीं सपा की मांगे—

राज्यपाल को सौंप गए ज्ञापन के माध्यम से ने मांग की है कि देश भर में सभी किसानों का पूरा कर्ज समाप्त किया जाए। कृषि उत्पाद का उसके उत्पादन लागत में 50 प्रतिशत जोड़कर किसान को फसलों का लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाये। भाजपा को लोकसभा चुनावों में किया गया वादा निभाते हुए डा0 स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट के सुझावों को अमल में लाया जाए।

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किसानों के साथ खड़ी है सपा—

सपा का कहना है कि किसान के क्षोभ, असंतोष और आक्रोश की उपेक्षा करना किसी भी स्थिति में देशहित में नहीं है। यह देश अभी भी गांवो में बसता है। मध्य प्रदेश के किसान के धैर्य का बांध टूटने पर स्थिति विस्फोटक और बेकाबू हो सकती है। मंदसौर उसका एक नमूना भर है। अगर भाजपा सरकार किसानों के प्रति संवेदनहीन रहेगी तो उत्तर प्रदेश का किसान भी अन्य राज्यों के किसानों के साथ आंदोलन के रास्ते पर होगा। हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब, राजस्थान में किसान आंदोलन की राह पर हैं।




पार्टी मध्य प्रदेश के किसानों की मांगों का पूर्णरूप से समर्थन करती है और वहां के किसानों के साथ खड़ी है। समाजवादी पार्टी विभिन्न प्रदेशों में किसानों के प्रति हो रहे उत्पीड़न की निंदा करती है।

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