संविधान से ऊपर नहीं है मुस्लिम पर्सनल लॉ: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद। तीन तलाक को लेकर देश में दशकों से एक बहस छिड़ी हुई है। इस पूरे मसले पर तीन तरह की विचारधाराएं आमने सामने हैं। पहली मुस्लिम समाज की उन महिलाओं की जिनकी जिन्दगी तीन तलाक से प्रभावित है। दूसरी विचारधारा मुस्लिम पर्सनल लॉ को कायम रखने वाले मुस्लिम समाज के उस बड़े हिस्से की है जिसके मुताबिक यह समस्या बहुत बड़ी नहीं है और अगर कुछ लोगों को समस्या है तो वह अपनी शरियत को उसके लिए बदलने को तैयार नहीं है। तीसरी विचार धारा देश के उस वर्ग की है जिसका मानना है कि एक देश में एक ही कानून होना चाहिए, महिलाओं और उनके मूल अधिकारों का हनन किसी सामाजिक या धार्मिक प्रथा के आधार पर नहीं होना चाहिए।



आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी तीन तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए मुस्लिम लॉ बोर्ड को फटकार लगाते हुए कहा है कि महिलाओं के मूल अधिकारों के हनन को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने सामाजिक मसलों पर फतवे जारी करने वाले धर्मगुरुओं को भी चेतावनी देते हुए कहा ​है कि किसी भी कानूनी मामले में फतवे जारी करना स्वीकार नहीं किया जा सकता।



एक नए मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस मुद्दे को गलत ठहराते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं सहित किसी भी व्यक्ति के मूल अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि लिंग के आधार पर मूल और मानवाधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है। अपनी टिप्पणी में कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पति ऐसे तरीके से तलाक नहीं दे सकता है, जिससे समानता और जीवन के मूल अधिकार का हनन हो। कोर्ट ने कहा कि पर्सनल लॉ को संविधान के दायरे में ही रखकर लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई भी फतवा जारी नहीं किया जाएगा, कोई भी फतवा किसी के अधिकारों के विपरीत नहीं जा सकता है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी राय रखते हुए कहा था कि इस प्रथा का सामाजिक रूप से बहिष्कार होना चाहिए।