आखिरकार पुनर्वविचार याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हुआ सुप्रीम कोर्ट

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आखिरकार पुनर्वविचार याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हुआ सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। एससी एसटी एक्ट में बदलाव के बाद पूरे देश में हुए हिंसात्मक प्रदर्शन के बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पुनर्वविचार याचिका दायर की थी। पहले तो कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई से इंकार कर दिया, लेकिन मामला बढ़ता देख वो इसके लिए तैयार हुआ। आज दो बजे कोर्ट इस मामले में खुली अदालत में सुनवाई के लिए राजी हो गया।

Sc St Act Issue In Supreme Court :

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम—1989 का दुरूपयोग रोंकने के लिए इसमें संशोधन करने के साथ ही नई गाइडलाइन जारी की थी। इसके विरोध में दलित संगठनों ने सोमवार को भारत बंद का ऐलान करते हुए हिंसा शुरु कर दी। बवाल के दौरान देश भर के 10 राज्यों में हिंसात्मक प्रदर्शन हुआ और जमकर तोड़फोड़ के साथ ही आगजनी की गई। इस कार्रवाई में करीब दर्जन भर लोगों की मौत हो गई, जबकि सैकड़ो लोग घायल हो गए। बताया जाता है कि मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा हिंसा फैलाई गई।

इनकी शिकायत पर कोर्ट ने जारी की नई गाइडलाइन

महाराष्ट के शिक्षा विभाग के एक कार्यालय में तैनात तकनी​की शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन पर उनके स्टोर कीपर ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का कहना था कि महाजन के दो अधीनस्थ् अधिकारियों ने उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट पर जातिसूचक टिप्पणी की थी। पुलिस ने जब दोनों आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी, तो उन्होने इसके लिए इंकार कर दिया। इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्ज कर लिया।

महाजन का तर्क था कि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के ​खिलाफ इमानदार व्यक्ति द्वारा कोई टिप्पणी करना अपराध नही है। अगर ऐसा हो जाएगा तो अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ काम करना मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद 5 मई 2017 को वो हाइकोर्ट पहुंचे और एफआईआर खारिज करने की मांग की। वहां से राहत नही मिली तो सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इस शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर खारिज करने के आदेश दिए और नई गाइडलाइन जारी कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एससी/एसटी एक्ट मे दर्ज मामले में पुलिस सात दिनों में जांच करे और मामला सही पाए जाने के बाद ही आरोपी के खिलाफ कार्रवाईकी जाए। वही सरकारी अधिकारी के खिलाफ यदि ऐसा कोई मामला दर्ज होता है कि तो उसकी गिरफ्तारी से पहले उसके वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी ले।

नई दिल्ली। एससी एसटी एक्ट में बदलाव के बाद पूरे देश में हुए हिंसात्मक प्रदर्शन के बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पुनर्वविचार याचिका दायर की थी। पहले तो कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई से इंकार कर दिया, लेकिन मामला बढ़ता देख वो इसके लिए तैयार हुआ। आज दो बजे कोर्ट इस मामले में खुली अदालत में सुनवाई के लिए राजी हो गया।आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम—1989 का दुरूपयोग रोंकने के लिए इसमें संशोधन करने के साथ ही नई गाइडलाइन जारी की थी। इसके विरोध में दलित संगठनों ने सोमवार को भारत बंद का ऐलान करते हुए हिंसा शुरु कर दी। बवाल के दौरान देश भर के 10 राज्यों में हिंसात्मक प्रदर्शन हुआ और जमकर तोड़फोड़ के साथ ही आगजनी की गई। इस कार्रवाई में करीब दर्जन भर लोगों की मौत हो गई, जबकि सैकड़ो लोग घायल हो गए। बताया जाता है कि मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा हिंसा फैलाई गई।

इनकी शिकायत पर कोर्ट ने जारी की नई गाइडलाइन

महाराष्ट के शिक्षा विभाग के एक कार्यालय में तैनात तकनी​की शिक्षा निदेशक सुभाष काशीनाथ महाजन पर उनके स्टोर कीपर ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का कहना था कि महाजन के दो अधीनस्थ् अधिकारियों ने उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट पर जातिसूचक टिप्पणी की थी। पुलिस ने जब दोनों आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी महाजन से इजाजत मांगी, तो उन्होने इसके लिए इंकार कर दिया। इस पर पुलिस ने महाजन पर भी केस दर्ज कर लिया।महाजन का तर्क था कि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के ​खिलाफ इमानदार व्यक्ति द्वारा कोई टिप्पणी करना अपराध नही है। अगर ऐसा हो जाएगा तो अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ काम करना मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद 5 मई 2017 को वो हाइकोर्ट पहुंचे और एफआईआर खारिज करने की मांग की। वहां से राहत नही मिली तो सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इस शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर खारिज करने के आदेश दिए और नई गाइडलाइन जारी कर दी।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एससी/एसटी एक्ट मे दर्ज मामले में पुलिस सात दिनों में जांच करे और मामला सही पाए जाने के बाद ही आरोपी के खिलाफ कार्रवाईकी जाए। वही सरकारी अधिकारी के खिलाफ यदि ऐसा कोई मामला दर्ज होता है कि तो उसकी गिरफ्तारी से पहले उसके वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी ले।