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शरद पवार पर भारी पड़ा उन्हीं का ‘धोबी पछाड़’, भतीजे ने ‘चैम्पियन’ को दी शिकस्त

Sharad Pawar Was Defeated By His Washerman Nephew Defeated Champion

By बलराम सिंह 
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नई दिल्ली। महाराष्ट्र में राजनीतिक मौसम ने अचानक करवट बदली है, उसे राज्य की राजनीति में धक्का तंत्र के नाम से जाना जाता है और शरद पवार को इसमें महारत हासिल है। महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के बारे में मशहूर है कि वो कब किससे मिलेंगे,किससे नहीं, यह कोई नहीं जानता है।

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इस उलटफेर की शुरुआत 1978 में हुई थी। उस समय कांग्रेस नेता वसंतदादा पाटिल राज्य के मुख्यमंत्री थे। उस समय 38 वर्ष के पवार ने कांग्रेस के ही कुछ विधायकों के साथ मिलकर पार्टी से विद्रोह कर दिया था और अपना एक अलग गुट बना लिया था। इस गुट का नाम प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पुलोदा) रखा गया था। कहा जाता है कि पवार ने उस समय पाटिल को धोखा देकर उनकी सरकार को खतरे में डाल दिया था।

समय बीता और कुछ वक्त बाद पवार दोबारा पार्टी में शामिल हो गए और 1990 में राज्य में सरकार बनाई। हालांकि उस समय कांग्रेस पार्टी के पास महाराष्ट्र विधान सभा में केवल 141 सीटें ही थीं, जो बहुमत से कम थीं। उस समय पवार ने अपने दोस्त बाल ठाकरे की पार्टी शिवसेना से सबसे मजबूत नेता छगन भुजबल को तोड़ा था। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पवार अपने सबसे अच्छे दोस्त की पार्टी में भी सेंध लगा सकते हैं। न ही किसी ने यह सोचा था कि भुजबल जैसे नेता अपने गॉडफादर को धोखा देते हुए पवार के साथ जा सकते हैं। लेकिन ऐसा हुआ और पवार के नाम पर यह दर्ज हुआ। इस घटना ने फिर साबित किया कि पवार की न तो किसी से दोस्ती है और न ही किसी से बैर।

इसके बाद 1999 में पवार ने एक बार फिर कांग्रेस को सकते में उस वक्त डाल दिया जब सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने के मुद्दे पर उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी। इस बार पार्टी के बड़े नेता पीए संगमा और तारिक अनवर भी उनके साथ थे। तब उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था।

नवी मुंबई को शिवसेना का मजबूत गढ़ माना जाता था। 1999 में ही पवार ने इसमें सेंध लगाई और शिवसेना के कद्दावर नेता गणेश नाईक को अपने साथ मिला लिया। इसके बाद पवार की नजर गई गोपीनाथ मुंडे के परिवार पर। दरअसल महाराष्ट्र के सभी नेताओं से निजी तौर पर पवार के हमेशा अच्छे संबंध रहे हैं। लेकिन मुंडे हमेशा उनका विरोध करते थे।

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2012 में पवार ने मुंडे को पहला धक्का तब दिया जब धनंजय मुंडे गोपीनाथ के भतीजे को वो अपनी पार्टी में शामिल करने में सफल हुए। धनंजय इस बात से दुखी थे कि गोपीनाथ उनके बजाय अपनी बेटी पंकजा को राजनीति में आगे बढ़ा रहे थे। 1995 में जब महाराष्ट्र में शिवेसना-भाजपा की सरकार थी, तो उसे कई निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल था। दरअसल, उनमें से अधिकांश विधायक पवार समर्थक थे।

अब तक जो कुछ शरद पवार करते आए हैं, अब वही उनके साथ हो रहा है। उनके अपने भतीजे अजित पवार ने महाराष्ट्र में भाजपा को समर्थन देते हुए देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बना ली है और खुद उपमुख्यमंत्री बन गए हैं। हालांकि कांग्रेस इसे शरद की चाल ही मान रही है। पार्टी का कहना है कि बगैर शरद पवार की रजामंदी के अजित यह कदम उठा ही नहीं सकते थे।

लेकिन समय और इतिहास कभी न कभी खुद को दोहराते जरूर हैं। 23 नवंबर 2019 की तारीख और सुबह 8 बजे का समय एनसीपी-कांग्रेस और शिवसेना कभी नहीं भूलेंगे। इस बार उलटफेर का श्रेय शरद पवार को नहीं, बल्कि उनके भतीजे अजित पवार के पास है।

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