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शारदीय नवरात्रि 2021: आज है महाष्टमी व्रत, जानें नवरात्रि हवन का मंत्र

सनातन संस्कृति में सुख-सौभाग्य के लिए हवन-यज्ञ की परंपरा रही है। हवन अथवा यज्ञ भारतीय परंपरा अथवा हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है। कुण्ड में अग्नि के माध्यम से ईश्वर की उपासना करने की प्रक्रिया को यज्ञ कहते हैं।

By अनूप कुमार 
Updated Date

शारदीय नवरात्रि 2021: सनातन संस्कृति में सुख-सौभाग्य के लिए हवन-यज्ञ की परंपरा रही है। हवन अथवा यज्ञ भारतीय परंपरा अथवा हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है। कुण्ड में अग्नि के माध्यम से ईश्वर की उपासना करने की प्रक्रिया को यज्ञ कहते हैं।औषधीय युक्त हवन सामग्री से हवन-यज्ञ करने से पर्यावरण शुद्ध होगा, वहीं वायरस का संक्रमण भी नष्ट हो जाएगा। नवरात्रि के दुर्गा अष्टमी और महानवमी के दिन कन्या का पूजन भी होता है। हवन के बाद ही नवरात्रि व्रत में पारण करने का विधान है। यदि आपके घर पर आज दुर्गा अष्टमी के अवसर पर ही नवरात्रि हवन होता है आईये जानतें है हवन करने की पूरी विधि के बारे में।

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नवरात्रि में हवन के समय स्वच्छता का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
जहां पर हवन कुंड है, उसके चारों तरफ के स्थान की साफ सफाई कर लेनी चाहिए और यह ध्यान रखें कि इसके इर्द-गिर्द कोई भी ज्वलनशील पदार्थ या वास्तु न हो।
हवन करने के पहले सभी पूजन सामग्री और हवन सामग्री को एकत्रित करके पास में रख लें, जिससे बीच में उठना न पड़े।
हवन करते समय अग्नि से हमेशा सावधान रहने की जरूरत है।

हवन करते समय किन-किन उँगलियों का प्रयोग किया जाय, इसके सम्बन्ध में मृगी और हंसी मुद्रा को शुभ माना गया है।

हवन मंत्र

ओम आग्नेय नम: स्वाहा

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ओम गणेशाय नम: स्वाहा

ओम गौरियाय नम: स्वाहा

ओम नवग्रहाय नम: स्वाहा

ओम दुर्गाय नम: स्वाहा

ओम महाकालिकाय नम: स्वाहा

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ओम हनुमते नम: स्वाहा

ओम भैरवाय नम: स्वाहा

ओम कुल देवताय नम: स्वाहा

ओम स्थान देवताय नम: स्वाहा

ओम ब्रह्माय नम: स्वाहा

ओम विष्णुवे नम: स्वाहा

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ओम शिवाय नम: स्वाहा

ओम जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा

स्वधा नमस्तुति स्वाहा।

ओम ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहा।

ओम गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा।

ओम शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।

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