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बकरीद 2020: जाने इस दिन क्यों दी जाती है जानवरों की कुर्बानी

Significance Of Eid Al Adha

By आस्था सिंह 
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नई दिल्ली। ‘ईद-उल-जुहा’ यानी बकरीद इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 12वें महीने धू-अल-`हिज्जा की दस तारीख को मनाया जाता है। चांद पर आधारित इस्लामिक कैलेंडर, अंग्रेजी कैलेंडर से 11 दिन कम छोटा है इसीलिए अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक, यह तारीख हर साल बदलती रहती है। अरबी देशों में बकरीद का नाम ईद-उल-जुहा में प्रचलित है।

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  • बकरीद पर कुर्बानी का मतलब यहां ऐसे बलिदान से हैं जो दूसरों के लिए दिया गया हो। बकरे या फिर अन्य जानवर की कुर्बानी केवल एक प्रतिकात्मक कुर्बानी दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अल्लाह के पास ह‌ड्डिायां, मांस और खून नहीं पहुंचता है। उनके पास केवल खुशु पहुंचती है यानी देने का जज्बाक। आप समाज की भलाई के लिए क्या दे सकते हैं।
    कुर्बानी का पहला नियम यह है कि जिसके पास 613 से 614 ग्राम चांदी हो यानी आज के हिसाब से इतनी चांदी की कीमत के बराबर धन हो। केवल उन्ही लोगों को कुर्बानी का फर्ज है यानी उसे कुर्बानी देनी चाहिए।
  • जिस किसी व्यक्ति के पास पहले से कर्ज है तो वह कुर्बानी नहीं दे सकता। कुर्बानी देने वाले के ऊपर उस समय कोई कर्ज नहीं होना चाहिए।
  • जो व्यक्ति अपनी कमाई का ढ़ाई फीसदी दान देता है। साथ ही समाज की भलाई के लिए धन के साथ हमेशा आगे रहता है। उसके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है।
  • शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो या छोटे पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती।
  • ईद की नमाज के बाद मांस के तीन हिस्से होते हैं। एक खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए। वैसे ज्यादातर लोग सभी हिस्सों का गरीबों में बांट देते हैं।

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