प्रधानमंत्री की स्मार्ट सिटी योजना की निकली हवा, ढ़ाई साल में नहीं खर्च हुए 9800 करोड़

लखनऊ। सरकारी योजनाएं तभी अंजाम तक पहुंचतीं हैं, जब सरकारी मशीनरी हर स्तर पर सक्रिय हो, नहीं तो योजनाओं का बजट बैंक खातों में ब्याज के साथ फलता फूलता रहता है। ऐसा ही कुछ हुआ है केन्द्र सरकार की स्मार्ट सिटी योजना का। ढ़ाई साल पहले अमल में लाई गई इस योजना के तहत देश के 60 शहरों को चिन्हित किया गया था। इन 60 शहरों को दो चरणों के प्लान के साथ स्मार्ट सिटी बनाने की पहल की गई। जिसके लिए केन्द्र सरकार की ओर से 9800 करोड़ रूपए की पहली किश्त भी जारी कर दी गई, लेकिन स्मार्ट सिटी योजना के प्रति राज्य सरकारों ने किसी प्रकार की पहल करना उचित नहीं समझा। परिणाम स्वरूप केन्द्र सरकार की ओर से जारी हजारों करोड़ रूपए सरकारी खातों में मोटे हो रहे हैं।

एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्ट सिटी योजना के तहत जारी हुई 9800 करोड़ की पहली किश्त में से राज्य सरकारें केवल 7 फीसदी बजट ही खर्च कर पाईं हैं। इसमें भी सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारें भी इस योजना को अमल में लाने में पूरी तरह से नाकाम रहीं हैं।

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स्मार्ट सिटी योजना के बजट को खर्च करने में पहले स्थान पर गुजरात का अहमदाबाद शहर ​है जिसने 196 करेाड़ में से सर्वाधिक 80.15 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जबकि मध्यप्रदेश का इंदौर शहर 196 करोड़ में से 76.69 करोड़ रुपए खर्च करके दूसरे स्थान पर है। इन आंकड़ों में देश के राजधानी दिल्ली की एनडीएमसी को मिले 196 करोड़ के अनुदान में से मात्र 34.61 करोड़ ही खर्च कर पाई है।

अगर इस मामले में यूपी के शहरों की चर्चा की जाए तो ताजनगरी आगरा को मिले 111 करोड़ में से केवल 56 लाख रूपए ही खर्च हुए हैं, जबकि कानपुर 111 करोड़ में से 3.25 करोड़ और राजधानी लखनऊ को मिले 196 करोड़ के अनुदान में से 48 लाख रूपए ही खर्च कर हुए हैं।

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यूपी के वाराणसी यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अपने निर्वाचन क्षेत्र को मिले 111 करोड़ के अनुदान में से केवल 2 करोड़ रुपए ही खर्च किए जा सके हैं। यह हाल केवल उत्तर प्रदेश का नहीं है, बल्कि अन्य प्रदेशों में भी हालात लगभग ऐसे ही हैं। 60 में 15 शहर ऐसे रहे हैं जो अपने अनुदान में से 1 करोड़ रुपए भी खर्च नहीं कर पाए हैं।

 

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