सर्पदंश दवा के लिए घोड़ों पर अत्याचार

नई दिल्ली: पशुओं और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था पेटा ने कहा है कि सर्पदंश की दवा तैयार करने की प्रक्रिया में तय दिशानिर्देशों का घोर उल्लघंन करते हुए प्रयोगशालाओं में घोड़ों पर बेहद निर्मम तरीके अपनाए जा रहे हैं ।पेटा इंडिया की जारी रिपोर्ट में भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के सव्रेक्षण का हवाला देते हुए कहा गया है कि सर्पदंश की दवा तैयार करने की प्रयोगशालाओं और केंद्रों में घोड़ों के रखरखाव, आसपास के पर्यावरण, साफ-सफाई, पौष्टिक और पर्याप्त चारे की व्यवस्था, रोग उपचार सुविधा और पर्याप्त संख्या में पशुचिकित्सकों का पर्याप्त अभाव देखा गया है। इसकी वजह से इन केंद्रों में तैयार सर्पदंश की दवाएं मानवीय उपयोग के लिए भी खतरताक हो सकती हैं।




कई बार इन दवाओं का अपेक्षित असर भी नहीं देखा गया। रिपोर्ट के अनुसार इन केन्द्रों में रोगी और बूढ़े हो चुके घोड़ों पर भी दवा के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं। कई बार इस प्रक्रिया में कुछ घोड़ों के शरीर से पांच हजार लीटर तक का रक्तस्रव तक देखा गया है। पशु कल्याण बोर्ड द्वारा 2015 में किए गए सव्रेक्षण के अनुसार इन केन्द्रों में औसतन 63 फीसद घोड़े मानसिक विकार से ग्रस्त हो पाए गए। करीब 48 फीसद में नेत्र विकार देखा गया। ऐसे ही 57 फीसद शारीरिक रूप से बेहद कमजोर पाए गए और अन्य में कई तरह की शारीरिक विकृतियां भी देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार इन प्रयोगशालाओं और केन्द्रों में सबसे खराब बात यहां पशु चिकित्सकों का खासा अभाव है। उपचार के लिए जो व्यवस्था है, वह भी पर्याप्त नहीं है। दवा तैयार करने की प्रक्रिया में घोड़ों के शरीर में सांप का जहर इंजेक्शन के जरिए डाला जाता है और फिर उसे घोड़े के रक्त के साथ इंजेक्शन से बाहर निकाल कर उससे दवा बनाई जाती है।

इस क्रम में कई बार इन पशुओं में शारीरिक विकार या फिर जख्म हो जाते हैं। इन जख्मों का पर्याप्त इलाज नहीं किया जाता। हद तो तब होती है जब कई बार मरणासन्न घोड़ों पर भी ऐसे प्रयोग किए जाते हैं। यह सब बेहद अमानवीय होता है। पेटा के अनुसार यह सब छोटी दवा कंपनियों की प्रयोगशालाओं में नहीं हो रहा बल्कि कई बड़ी नामी गिरामी कंपनियां और केन्द्र इस कृत्य में शामिल हैं जिसमें सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, हैफकिन बॉयो फार्मास्युटिकल्स और मेडीक्लोन बॉयोटेक प्राइवेट लिमिटेड प्रमुख हैं।