तो क्या स्मार्ट सिटी योजना है छलावा, सिर्फ कार्ययोजना में ही खर्च हो रही रकम

smart city
तो स्मार्ट सिटी योजना है छलावा, सिर्फ कार्ययोजना में ही खर्च हो रही रकम

नई दिल्ली। देश के प्रमुख शहरों को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने के लिए सरकार द्वारा ​की जाने वाली सारी घोषणाएं मात्र छलावा ही घोषित हो रही हैं। दरअसल करीब चार वर्ष पहले सरकार ने देश के करीब सौ शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी, यहीं नहीं सभी शहरों को सौ—सौ करोड़ रूपए आवंटित कर जल्द से जल्द शहरों का कायाकल्प बनाने का फरमान भी सुना दिया गया था। अगर उसी वक्त शहरों में काम शुरु हो गया होता तो आज ज्यादातर शहरों में काम पूरा हो गया होता, लेकिन इन सभी शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का काम सिर्फ कार्ययोजना तक ही सीमित रह गया है।

So Smart City Planning Is A Trick Just The Amount Spent In The Work Plan :

सूत्रों का कहना है कि स्मार्ट सिटी बनने वाले इन शहरों में बीते चार वर्षों में सिर्फ कार्ययोजना बनाने के नाम पर दर्जनों मीटिंग हो चुकी हैं, जिनमें वहां के जिलाधिकारी समेत राज्य व केन्द्र के दर्जनों अधिकारी शामिल होते हैं। आलम ये है कि इन शहरों को जो धन आवंटित हुआ था, वो अभी वैसे का वैसा ही पड़ा हुआ है। तमाम शहर ऐसे हैं, जहां कार्ययोजना बनाने के लिए होने वाली मीटिंग्स में ही धन खर्च हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि इन मीटिंग में व्यवस्थाओं के नाम पर करीब तीन से चार करोड़ रूपए खर्च हो चुका है, जो कि पूरी तरह व्यर्थ है।

स्मार्ट सिटी के लिए चिन्हित किए गए उन शहरों का आलम ये है कि यहां गंदगी का अंबार लगा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि जब भी कोई प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनजीटी की टीम यहां जांच करने के लिए आती है तो जिलाधिकारी से लेकर सभी सम्बंधित अधिकारियों को पहले ही सूचित कर दिया जाता है और जिससे की वो अधिकारी पूरी सेटिंग कर लें। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि अधिकारी जांच टीमों को चढ़ावा चढ़ाकर उन्हे वापस कर देते है।

अब सवाल ये उठता है कि करीब चार साल बीत जाने के बाद जब इन शहरों में काम की शुरुआत ही नहीं हुई तो आगे का काम कैसे हो सकता है, जबकि इसके लिए बजट के लिए पहले ही दिया जा चुका है। शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए जिस तरह से काम हो रहा है कि उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे के कई वर्षों तक इस दिशा में कोई भी सकारात्मक नतीजे मिल सकते हैं।

नई दिल्ली। देश के प्रमुख शहरों को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने के लिए सरकार द्वारा ​की जाने वाली सारी घोषणाएं मात्र छलावा ही घोषित हो रही हैं। दरअसल करीब चार वर्ष पहले सरकार ने देश के करीब सौ शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी, यहीं नहीं सभी शहरों को सौ—सौ करोड़ रूपए आवंटित कर जल्द से जल्द शहरों का कायाकल्प बनाने का फरमान भी सुना दिया गया था। अगर उसी वक्त शहरों में काम शुरु हो गया होता तो आज ज्यादातर शहरों में काम पूरा हो गया होता, लेकिन इन सभी शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का काम सिर्फ कार्ययोजना तक ही सीमित रह गया है। सूत्रों का कहना है कि स्मार्ट सिटी बनने वाले इन शहरों में बीते चार वर्षों में सिर्फ कार्ययोजना बनाने के नाम पर दर्जनों मीटिंग हो चुकी हैं, जिनमें वहां के जिलाधिकारी समेत राज्य व केन्द्र के दर्जनों अधिकारी शामिल होते हैं। आलम ये है कि इन शहरों को जो धन आवंटित हुआ था, वो अभी वैसे का वैसा ही पड़ा हुआ है। तमाम शहर ऐसे हैं, जहां कार्ययोजना बनाने के लिए होने वाली मीटिंग्स में ही धन खर्च हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि इन मीटिंग में व्यवस्थाओं के नाम पर करीब तीन से चार करोड़ रूपए खर्च हो चुका है, जो कि पूरी तरह व्यर्थ है। स्मार्ट सिटी के लिए चिन्हित किए गए उन शहरों का आलम ये है कि यहां गंदगी का अंबार लगा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि जब भी कोई प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनजीटी की टीम यहां जांच करने के लिए आती है तो जिलाधिकारी से लेकर सभी सम्बंधित अधिकारियों को पहले ही सूचित कर दिया जाता है और जिससे की वो अधिकारी पूरी सेटिंग कर लें। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि अधिकारी जांच टीमों को चढ़ावा चढ़ाकर उन्हे वापस कर देते है। अब सवाल ये उठता है कि करीब चार साल बीत जाने के बाद जब इन शहरों में काम की शुरुआत ही नहीं हुई तो आगे का काम कैसे हो सकता है, जबकि इसके लिए बजट के लिए पहले ही दिया जा चुका है। शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए जिस तरह से काम हो रहा है कि उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे के कई वर्षों तक इस दिशा में कोई भी सकारात्मक नतीजे मिल सकते हैं।