जन्मदिन विशेष : इंदिरा गांधी की बदौलत ही रायबरेली को मिली एक राजनीतिक पहचान

indara gandhi
पूर्व पीएम की जयंती पर विशेष : इंदिरा गांधी की बदौलत ही रायबरेली को मिली एक राजनीतिक पहचान

रायबरेली। देश की राजनीति में अलग पहचान बनाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से भावनात्म रिश्ता रहा। पति फिरोज गांधी की राजनीतिक विरासत संभालने आईं इंदिरा यहीं की होकर रह गईं। इंदिरा गांधी की बदौलत ही रायबरेली को एक राजनीतिक पहचान मिल सकी। यहां से तीन बार सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने कई काम किए। हालांकि, इसके बाद भी उन्हें यहां से हार का दंश झेलना पड़ा।

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पूर्व पीएम इंदिरा गांधी आजादी के पहले भी रायबरेली आ चुकी थीं। जवाहरलाल नेहरू के साथ कांग्रेस के आंदोलन के दौरान उनका रायबरेली आना जाना रहा है। पति फिरोज गांधी के रायबरेली से पहला चुनाव लड़ने में उन्हीं की मुख्य भूमिका रही है। 1952 और 1957 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने गांव-गांव जाकर पति फिरोज के लिए प्रचार किया। स्थानीय नेताओं से मिलकर उन्होंने फिरोज गांधी के दोनों चुनाव में अहम रोल निभाया था। वहीं, रायबरेली से वह पहली बार 1967 में चुनाव जीतकर संसद पहुंची।

इसके बाद देखते ही देखते रायबरेली देशभर में चर्चित हो गया। पूरे देश की निगाहें रायबरेली पर टिक गईं और यहां के लोगों की उम्मीदें इंदिरा गांधी पर। इंदिरा गांधी ने भी इसे बखूबी समझा और रायबरेली को एक विकास मॉडल के रूप में रखा। बड़ी सिंचाई परियोजना से लेकर एनटीपीसी, आईटीआई सहित कई बड़ी फैक्ट्रियां यहां खोली गईं। विकास को लेकर इंदिरा गांधी जनता से सीधे संवाद करती थीं।

विकास गोष्ठी के माध्यम से जनता से जुड़े विकास के मुद्दे को सुलझाया जाता था। इंदिरा गांधी द्वारा रायबरेली में किये गए विकास कार्यों को लोग आज भी भूलें नहीं हैं। बाद के वर्षों में भी इंदिरा गांधी ने यहां से प्रतिनिधित्व किया, जिससे रायबरेली में विकास का क्रम बदस्तूर जारी रहा।

हालांकि इसके बावजूद 1977 के आम चुनाव में उन्हें रायबरेली में पराजय का सामना करना पड़ा। 1977 की जनता पार्टी की लहर में वह रायबरेली से भी करीब 50000 वोटों से हारीं थीं। हालांकि बावजूद इसके वह यहां के लोगों से लगातार जुड़ी रहीं। लेकिन 1980 के चुनाव में उन्होंने यहां के लोगो पर पूरा भरोसा नहीं किया और दूसरी सीट चिकमंगलूर से भी चुनाव लड़ीं। दोनों सीट से उन्होंने जीत दर्ज की।

रायबरेली। देश की राजनीति में अलग पहचान बनाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से भावनात्म रिश्ता रहा। पति फिरोज गांधी की राजनीतिक विरासत संभालने आईं इंदिरा यहीं की होकर रह गईं। इंदिरा गांधी की बदौलत ही रायबरेली को एक राजनीतिक पहचान मिल सकी। यहां से तीन बार सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने कई काम किए। हालांकि, इसके बाद भी उन्हें यहां से हार का दंश झेलना पड़ा। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी आजादी के पहले भी रायबरेली आ चुकी थीं। जवाहरलाल नेहरू के साथ कांग्रेस के आंदोलन के दौरान उनका रायबरेली आना जाना रहा है। पति फिरोज गांधी के रायबरेली से पहला चुनाव लड़ने में उन्हीं की मुख्य भूमिका रही है। 1952 और 1957 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने गांव-गांव जाकर पति फिरोज के लिए प्रचार किया। स्थानीय नेताओं से मिलकर उन्होंने फिरोज गांधी के दोनों चुनाव में अहम रोल निभाया था। वहीं, रायबरेली से वह पहली बार 1967 में चुनाव जीतकर संसद पहुंची। इसके बाद देखते ही देखते रायबरेली देशभर में चर्चित हो गया। पूरे देश की निगाहें रायबरेली पर टिक गईं और यहां के लोगों की उम्मीदें इंदिरा गांधी पर। इंदिरा गांधी ने भी इसे बखूबी समझा और रायबरेली को एक विकास मॉडल के रूप में रखा। बड़ी सिंचाई परियोजना से लेकर एनटीपीसी, आईटीआई सहित कई बड़ी फैक्ट्रियां यहां खोली गईं। विकास को लेकर इंदिरा गांधी जनता से सीधे संवाद करती थीं। विकास गोष्ठी के माध्यम से जनता से जुड़े विकास के मुद्दे को सुलझाया जाता था। इंदिरा गांधी द्वारा रायबरेली में किये गए विकास कार्यों को लोग आज भी भूलें नहीं हैं। बाद के वर्षों में भी इंदिरा गांधी ने यहां से प्रतिनिधित्व किया, जिससे रायबरेली में विकास का क्रम बदस्तूर जारी रहा। हालांकि इसके बावजूद 1977 के आम चुनाव में उन्हें रायबरेली में पराजय का सामना करना पड़ा। 1977 की जनता पार्टी की लहर में वह रायबरेली से भी करीब 50000 वोटों से हारीं थीं। हालांकि बावजूद इसके वह यहां के लोगों से लगातार जुड़ी रहीं। लेकिन 1980 के चुनाव में उन्होंने यहां के लोगो पर पूरा भरोसा नहीं किया और दूसरी सीट चिकमंगलूर से भी चुनाव लड़ीं। दोनों सीट से उन्होंने जीत दर्ज की।