बदहाली का शिकार ‘अटल’ का गांव बटेश्वर, पलायन को मजबूर लोग

लखनऊ। केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार भले ही विकास के तमाम दावे करती हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाख दावे करते हो कि उनकी सरकार गांव, गरीब और किसान को समर्पित है, लेकिन इन दावों की पोलने वाली तस्वीर यूपी के बटेश्वर गांव में नजर आती है। यह गांव देखने में देश के सामान्य गांवों में से एक ही नजर आता है, लेकिन गांव का जिक्र खबर में इसलिए हो रहा है क्योंकि यह गांव भाजपा के कद्दावर नेता और देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की जन्मस्थली है और यहां भी तमाम जन समस्याएं ठीक वैसी ही हैं जैसी किसी बद्हाल गांव में होतीं हैं।




अटल बिहारी वाजपेयी के गांव के रूप में पहचान रखने वाले बटेश्वर गांव की अपनी अलग ही कहानी है। इस गांव को इंतजार है कि कब अटल बिहारी बाजपेई के नाम को आगे कर चुनावों में जाने वाली पार्टी की सरकार उनकी सुध लेगी। गांववालों को सबसे बड़ा दर्द इस बात का है कि उनके अपने सांसद ने इस गांव से दूरी बना रखी है। गांव में रह रहे अटल जी के परिवजन कहते हैं कि जब प्रधानमंत्री ने हर सांसद से एक गांव गोद लेने को कहा तो पूरे गांव के अंदर एक उम्मीद जागी कि अब उनके गांव का नंबर पहला होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।




गांव वाले कहते हैं कि पार्टी के पास यूपी में 71 सांसद हैं। चाहता तो कोई भी सांसद अटल जी की जन्मस्थली के रूप में इस गांव का कायाकल्प करने का प्रयास कर सकता था। एक बड़ी उम्मीद थी कि पार्टी के नेता इस गांव की ओर रुख जरूर करेंगे। एक दशक की तरह ही ढ़ाई साल बीत गए लेकिन यहां हालात नहीं बदले। अटल जी द्वारा करवाए गए विकास कार्य को याद करते हुए गांव में रह रहे उनके रिश्ते के भतीजे और रिटायर्ड अध्यापक रमेश चन्द्र वाजपेई कहते हैं कि 2003 में अटल जी गांव आए थे, रेलवे लाइन का शिलान्यास करने। उन्होंने जो काम किया वही हुआ उसके बाद से यह गांव अनदेखी का शिकार है।




68 साल की उम्र में गांव के हालात के बारे में बताते हुए रमेश चन्द्र वाजपेई कहते हैं कि यहां पानी की किल्लत बहुत बड़ी। गांवों में जहां पानी की टंकी बन रहीं हैं उनके गांव में गिने चुने हैंडपंप हैं जिन पर पूरा गांव निर्भर है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्हें पानी की बाल्टियां हैंडपंप से लेकर घर तक लानी पड़तीं हैं। पिछले दिनों बीमार पड़ गए तो अब ये काम उनकी बूढ़ी पत्नी करने को मजबूर है।

रमेश आगे बताते हैं कि अटल जी की तबियत खराब होने के बाद से पार्टी के नेताओं ने भी इस गांव की ओर देखना बंद कर दिया है। एक समय ऐसा भी था जब इस गांव में रौनक रहती थी। गांव का बाजपेई मोहल्ला कभी चमकता रहता था। अब हालात बिलकुल अलग हैं, अटल जी का मकान ही खंडहर हो चुका है। मोहल्ले के लोग पलायन कर चुके हैं। कुल पांच परिवार बचे हैं जो गांव में टिके हुए हैं।




आगरा जिले की वाह तहसील के अंतर्गत आने वाला बटेश्वर गांव यूपी की फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र में आता है। जहां के सांसद चौधरी बाबू लाल हैं। इस गांव की पहचान पश्चि​मी उत्तर प्रदेश में एक तीर्थ के रूप में भी है। यमुना नदी के किनारे बसे बटेश्वर में एक घाट है जहां 101 शिवलिंग बने हुए हैं। इन सभी शिवलिंगों से होकर यमुना की धारा उल्टी दिशा में बहती है। इस घाट की वजह से बटेश्वर को एक धर्मिक स्थली के रूप में भी जाना जाता है। एक मान्यता है कि ये शिवलिंग यमुना नदी के बहाव से स्वयं प्रकट हुए हैं।




इस खबर के जरिए हमारा प्रयास है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गांवों के विकास के जो दावे करते हैं या गांवों के विकास के लिए जो सरकारी योजनाएं लागू करें उनका एकबार रियलिटी चेक जरूर करें। हम यह नहीं कहते कि बटेश्वर प्राथमिकता पर हो लेकिन हम इतना जरूर कहते हैं कि अगर आपकी सरकार अटल बिहारी बाजपेई को भारत रत्न देने की पहल कर सकती है तो कम से कम आपकी पार्टी वाली सरकार में शामिल स्थानीय सांसद की जिम्मेदारी बनती है कि वह अटल जी की जन्मस्थली के विकास पर भी थोड़ा ध्यान दें।