‘बीहड़ से संसद’ का सफर, कुछ ऐसी है ‘फूलन देवी’ की कहानी

लखनऊ। औरत जब बंदूक उठाती है तो उसका रूप कैसा होता है। घूंघट के पीछे छिपी रहने वाली अबला जब घूंघट हटाती है तो अंजाम क्या होता है? जब एक नारी अपने सिर पर कफन बांध निकलती है तो मंज़र कैसा होता है… इन सभी सवालों का जबाब जानने के लिए आपको जानना होगा चंबल की शेरनी कही जाने वाली फूलन देवी की कहानी।

फूलन देवी का जन्‍म साल 1963 में 10 अगस्‍त को हुआ था। जिसकी बचपन में ही शादी कर दी गयी थी, 18 साल की उम्र में उनके साथ गांव के ही ठाकुर समाज के कई लोगों ने गैंगरेप किया। उनके बेहोश होने तक दरिंदगी की गई। इसके बाद जुल्म की शिकार फूलन ने ने बीहड़ का रास्ता अपनाया जो उन दिनों डाकुओ का केंद्र हुआ करता था। गैंगरेप की वारदात के बाद इसका बदला लेने के लिए उन्‍होंने 22 ठाकुरों की हत्‍या कर दी, जो बहमाई हत्‍याकांड के नाम से जाना जाता है।

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फूलन देवी ने फांसी न दिए जाने की शर्त पर साल 1983 में सरेंडर किया था। सरेंडर करते वक्‍त फूलन पर 48 मामले दर्ज थे, जिनमें से 30 डकैती और बाकी अपहरण और लूट के थे। 11 साल बिना सुनवाई के जेल में रहने के बाद बाद में यूपी सरकार ने सारे आरोप वापस ले लिए। साल 1996 में यूपी के मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं।

साल 1996 में यूपी के मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। साल 1994 में शेखर कपूर ने उनके जीवन पर आधारित बैंडिट क्‍वीन फिल्‍म बनाई। जो काफी विवादों और चर्चा में रही।

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