भोपाल गैस त्रासदी: 34 साल बाद बीत गए, लेकिन चश्मदीदों के आज भी छलक पड़ते हैं आंसू

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भोपाल गैस त्रासदी: 34 साल बाद बीत गए, लेकिन चश्मदीदों के आज भी छलक पड़ते हैं आंसू

लखनऊ। भोपाल में घटित उस काली रात के 34 साल बीत गए, लेकिन उस घटना को जिसने भी करीब से देखा, आज भी उस भयानक दृश्य के बारे में सोंचकर रूह कांप जाती है। वो इतनी दर्दनाक घटना थी, लेकिन इसके बावजूद भी वो एक अराजनैतिक विषय बन गया है। जिन लोगों को न्याय, हक और समानता के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी है, उन्होने मान लिया है कि अब यह कोई विषय ही नहीं है,

Story On Bhopal Gas Tragedy Of 1984 :

बता दें कि गैस कांड के वक्त मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की सरकार थी। उसके बाद प्रदेश ने सुंदरलाल पटवा, दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर और किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नवाजा, पर कोई भी व्यवस्था, कोई भी व्यक्ति भोपाल गैस त्रासदी से न्याय नहीं कर पाया।

आलम ये है कि जिस गैस त्रासदी को लेकर दुनिया थू—थू कर रही है, 2018 के विधानसभा चुनाव में वो कोई मुद्दा ही नहीं रही। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों से यह बिंदु लगभग गायब है। जो लोग भोपाल गैस त्रासदी के बारे में नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि यह पिछली सदी की सबसे बुरी घटनाओं में से एक रही है। मध्यप्रदेश की राजधानी में शहर के बीचों-बीच एक कारखाना हुआ करता था, जिसका नाम था युनियन कार्बाइड। 2 और 3 दिसंबर, 1984 की रात में जब पूरा शहर गहरी नींद में था, उस वक्त एक गैस मिक (मिथाइल आइसोसाइनेट) इस कारखाने से रिसी और देखते ही देखते सर्द हवा में फैलती गई।

तीन दिसंबर की सुबह जब लोग जगे तो उनके आंगन सैकड़ों लाशें एक साथ थीं। गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन रातों—रात भाग गया, जिसे भगाने का आरोप सत्ता पर ही लगा। बाद की सरकारें भी केवल एक बार उसे भारत ला पाईं. इस मामले में जिन आठ आरोपियों को दो-दो साल की सजा सुनाई गई थी, उनमें से एक अब भी फरार है। उस वक्त जिस शकील कुरैशी की मशीन चलाने की जिम्मेदारी थी, उसे कोई सजा नहीं सुनाई गई, वो आज तक फरार है। आलम ये है कि सीबीआई के पास उस गुनहगार की एक तस्वीर तक नहीं है। वो बिना तस्वीर के ही उसे खोज रही है।

बता दें कि इस मामले में सरकार ने 22121 मामलों को मृत्यु की श्रेणी में दर्ज किया गया था। जबकि 574386 मामलों में तकरीबन 1548.59 करोड़ रुपए की मुआवाज राशि बांटी गई, लेकिन क्या मुआवजा राशि भर बांटा जाना पर्याप्त था। फिलहाल उस गैस त्रासदी के वक्त जो भी वहां मौजूद था और किसी तरह उसकी जान बच गई, वो आज भी उस मंजर को याद करता है कि आंखो से आंसू छलक पड़ते है।

लखनऊ। भोपाल में घटित उस काली रात के 34 साल बीत गए, लेकिन उस घटना को जिसने भी करीब से देखा, आज भी उस भयानक दृश्य के बारे में सोंचकर रूह कांप जाती है। वो इतनी दर्दनाक घटना थी, लेकिन इसके बावजूद भी वो एक अराजनैतिक विषय बन गया है। जिन लोगों को न्याय, हक और समानता के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी है, उन्होने मान लिया है कि अब यह कोई विषय ही नहीं है,बता दें कि गैस कांड के वक्त मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की सरकार थी। उसके बाद प्रदेश ने सुंदरलाल पटवा, दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर और किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नवाजा, पर कोई भी व्यवस्था, कोई भी व्यक्ति भोपाल गैस त्रासदी से न्याय नहीं कर पाया।आलम ये है कि जिस गैस त्रासदी को लेकर दुनिया थू—थू कर रही है, 2018 के विधानसभा चुनाव में वो कोई मुद्दा ही नहीं रही। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों से यह बिंदु लगभग गायब है। जो लोग भोपाल गैस त्रासदी के बारे में नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि यह पिछली सदी की सबसे बुरी घटनाओं में से एक रही है। मध्यप्रदेश की राजधानी में शहर के बीचों-बीच एक कारखाना हुआ करता था, जिसका नाम था युनियन कार्बाइड। 2 और 3 दिसंबर, 1984 की रात में जब पूरा शहर गहरी नींद में था, उस वक्त एक गैस मिक (मिथाइल आइसोसाइनेट) इस कारखाने से रिसी और देखते ही देखते सर्द हवा में फैलती गई।तीन दिसंबर की सुबह जब लोग जगे तो उनके आंगन सैकड़ों लाशें एक साथ थीं। गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन रातों—रात भाग गया, जिसे भगाने का आरोप सत्ता पर ही लगा। बाद की सरकारें भी केवल एक बार उसे भारत ला पाईं. इस मामले में जिन आठ आरोपियों को दो-दो साल की सजा सुनाई गई थी, उनमें से एक अब भी फरार है। उस वक्त जिस शकील कुरैशी की मशीन चलाने की जिम्मेदारी थी, उसे कोई सजा नहीं सुनाई गई, वो आज तक फरार है। आलम ये है कि सीबीआई के पास उस गुनहगार की एक तस्वीर तक नहीं है। वो बिना तस्वीर के ही उसे खोज रही है।बता दें कि इस मामले में सरकार ने 22121 मामलों को मृत्यु की श्रेणी में दर्ज किया गया था। जबकि 574386 मामलों में तकरीबन 1548.59 करोड़ रुपए की मुआवाज राशि बांटी गई, लेकिन क्या मुआवजा राशि भर बांटा जाना पर्याप्त था। फिलहाल उस गैस त्रासदी के वक्त जो भी वहां मौजूद था और किसी तरह उसकी जान बच गई, वो आज भी उस मंजर को याद करता है कि आंखो से आंसू छलक पड़ते है।