SC/ST एक्ट पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका

SC/ST एक्ट
SC/ST एक्ट पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (sc) और अनुसूचित जनजाति (st) अत्याचार निवारण एक्ट मे केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है कोर्ट ने  SC/ST कानून के तहत तुंरत गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले फैसले पर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई जुलाई तक के लिए टाल दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एकतरफा बयानों के आधार पर किसी नागरिक के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी रहे तो समझिए हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं।

Supreme Court On Central Government Sc St Act Review Petition :

जस्टिस आदर्श गोयल ने कहा कि यहां तक कि संसद भी ऐसा कानून नहीं बना सकती जो नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन करता हो और बिना प्रक्रिया के पालन के सलाखों के पीछे डालता हो। कोर्ट ने ये आदेश अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार को सरंक्षण देने के लिए दिया है। कोर्ट ने कहा कि जीने के अधिकार के लिए किसी को इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं अटॉनी जनरल (AG) केके वेणुगोपाल ने कहा कि जीने का अधिकार बडा व्यापक है। इसमें रोजगार का अधिकार, शेल्टर भी मौलिक अधिकार हैं, लेकिन विकासशील देश के लिए सभी के मौलिक अधिकार पूरा करना संभव नहीं है। क्या सरकार सबको रोजगार दे सकती है?

क्या है मामला

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस एससी/एसटी अत्याचार निवारण एक्ट-1989 के दुरुपयोग होने का हवाला देते हुए इसके तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान भी किया गया था। जबकि मूल कानून में अग्रिम जमानत की व्यवस्था नहीं की गई है। कोर्ट के फैसले के अनुसार दर्ज मामलों में गिरफ्तारी से पहले डिप्टी एसपी या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी आरोपों की जांच करेगा और फिर कार्रवाई होगी।

बिल को संविधान की 9वीं अनुसूची के दायरे में लाने की तैयारी

केंद्र सरकार अब अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए एक अध्यादेश लाने वाली है। बाद में वह संसद में एक विधेयक पेश करके इस मामले में न्यायिक चुनौती के रास्ते भी बंद कर देगी। इसके लिए वह बिल को संविधान की नौवीं अनुसूची के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (sc) और अनुसूचित जनजाति (st) अत्याचार निवारण एक्ट मे केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है कोर्ट ने  SC/ST कानून के तहत तुंरत गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले फैसले पर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई जुलाई तक के लिए टाल दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एकतरफा बयानों के आधार पर किसी नागरिक के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी रहे तो समझिए हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं।जस्टिस आदर्श गोयल ने कहा कि यहां तक कि संसद भी ऐसा कानून नहीं बना सकती जो नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन करता हो और बिना प्रक्रिया के पालन के सलाखों के पीछे डालता हो। कोर्ट ने ये आदेश अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार को सरंक्षण देने के लिए दिया है। कोर्ट ने कहा कि जीने के अधिकार के लिए किसी को इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं अटॉनी जनरल (AG) केके वेणुगोपाल ने कहा कि जीने का अधिकार बडा व्यापक है। इसमें रोजगार का अधिकार, शेल्टर भी मौलिक अधिकार हैं, लेकिन विकासशील देश के लिए सभी के मौलिक अधिकार पूरा करना संभव नहीं है। क्या सरकार सबको रोजगार दे सकती है?

क्या है मामला

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस एससी/एसटी अत्याचार निवारण एक्ट-1989 के दुरुपयोग होने का हवाला देते हुए इसके तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान भी किया गया था। जबकि मूल कानून में अग्रिम जमानत की व्यवस्था नहीं की गई है। कोर्ट के फैसले के अनुसार दर्ज मामलों में गिरफ्तारी से पहले डिप्टी एसपी या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी आरोपों की जांच करेगा और फिर कार्रवाई होगी।

बिल को संविधान की 9वीं अनुसूची के दायरे में लाने की तैयारी

केंद्र सरकार अब अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए एक अध्यादेश लाने वाली है। बाद में वह संसद में एक विधेयक पेश करके इस मामले में न्यायिक चुनौती के रास्ते भी बंद कर देगी। इसके लिए वह बिल को संविधान की नौवीं अनुसूची के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है।