केन्द्र की मोदी सरकार को झटका, राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट दोबारा सुनवाई के लिए तैयार

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केन्द्र की मोदी सरकार को झटका, राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट दोबारा सुनवाई के लिए तैयार

नई दिल्ली। राफेल डील को लेकर घिर रही मोदी सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट मामले में दोबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। राफेल डील पर दोबारा सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार की दलीलों को कोर्ट ने खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से लीक हुए दस्तावेजों की वैधता को मंजूरी दे दी है। कोर्ट के मुताबिक दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का हिस्सा होंगे।

Supreme Court Ready To Hear Again On Rafael Deal :

सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राफेल डील से संबंधित तीन दस्तावेजों को स्वीकर करने की अनुमति प्रदान कर दी है। सरकार पहले याचिका में शामिल सभी दस्तावेजों को विशेषाधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर कोर्ट में प्रस्तुत करने और सार्वजनिक करने का विरोध कर रही थी।

सुप्रीम कोर्ट में राफेल मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं से 15 मार्च को हुई सुनावाई में कहा था कि वो राफेल डील के दस्तावेज लीक होने से जुड़ी प्राथमिक आपत्तियों पर फोकस करें।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने कहा था कि सरकार द्वारा उठाई गई प्राथमिक आपत्तियों पर निर्णय लेने के बाद ही इस मामले में फैक्ट की जांच की जाएगी। वहीं 14 मार्च को इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था।

इन दस्तावेजों को मान्यता देने पर केन्द्र सरकार की ओर से आपत्ति जाहिर की गयी थी। 14 दिसंबर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे के खिलाफ सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

सरकार ने दावा किया था कि 14 दिसंबर, 2018 के कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दिए गए दस्तावेजों पर उसका विशेषाधिकार है। सरकार ने कहा था कि याचिका की सुनवाई के लिए इन दस्तावेजों पर कोर्ट संज्ञान ना ले। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा, पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी और सामाजिक कार्यकर्ता-वकील प्रशांत भूषण की तरफ से दायर याचिका को खारिज करने की सरकार ने मांग की थी।

केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा था कि तीनों याचिकाकर्ताओं ने अपनी समीक्षा याचिका में जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, उनपर उसका विशेषाधिकार है और उन दस्तावेजों को याचिका से हटा देना चाहिए। सरकार का कहना है कि मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी अनधिकृत रूप से तैयार की गईं और इसकी जांच की जा रही है ।

अटॉर्नी जनरल (AG) के वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि प्रस्तुत दस्तावेज विशेषाधिकार प्राप्त दस्तावेज हैं, जिन्हें भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के अनुसार सबूत नहीं माना जा सकता है। इन दस्तावेजों को आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत संरक्षित किया जाता है। साथ ही एजी ने यह भी कहा कि दस्तावेजों के प्रकटीकरण को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत धारा 8 (1) (ए) के अनुसार छूट दी गई है।

याचिकाकर्ताओं में से एक प्रशांत भूषण ने AG के दावों को गलत बताते हुए कहा कि विशेषाधिकार का दावा उन दस्तावेजों पर नहीं किया जा सकता जो पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 केवल “अप्रकाशित दस्तावेजों” की रक्षा करती है।

नई दिल्ली। राफेल डील को लेकर घिर रही मोदी सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट मामले में दोबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। राफेल डील पर दोबारा सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार की दलीलों को कोर्ट ने खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय से लीक हुए दस्तावेजों की वैधता को मंजूरी दे दी है। कोर्ट के मुताबिक दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का हिस्सा होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राफेल डील से संबंधित तीन दस्तावेजों को स्वीकर करने की अनुमति प्रदान कर दी है। सरकार पहले याचिका में शामिल सभी दस्तावेजों को विशेषाधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर कोर्ट में प्रस्तुत करने और सार्वजनिक करने का विरोध कर रही थी।

सुप्रीम कोर्ट में राफेल मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं से 15 मार्च को हुई सुनावाई में कहा था कि वो राफेल डील के दस्तावेज लीक होने से जुड़ी प्राथमिक आपत्तियों पर फोकस करें।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने कहा था कि सरकार द्वारा उठाई गई प्राथमिक आपत्तियों पर निर्णय लेने के बाद ही इस मामले में फैक्ट की जांच की जाएगी। वहीं 14 मार्च को इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था।

इन दस्तावेजों को मान्यता देने पर केन्द्र सरकार की ओर से आपत्ति जाहिर की गयी थी। 14 दिसंबर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे के खिलाफ सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

सरकार ने दावा किया था कि 14 दिसंबर, 2018 के कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दिए गए दस्तावेजों पर उसका विशेषाधिकार है। सरकार ने कहा था कि याचिका की सुनवाई के लिए इन दस्तावेजों पर कोर्ट संज्ञान ना ले। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा, पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी और सामाजिक कार्यकर्ता-वकील प्रशांत भूषण की तरफ से दायर याचिका को खारिज करने की सरकार ने मांग की थी।

केंद्र सरकार ने कोर्ट से कहा था कि तीनों याचिकाकर्ताओं ने अपनी समीक्षा याचिका में जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, उनपर उसका विशेषाधिकार है और उन दस्तावेजों को याचिका से हटा देना चाहिए। सरकार का कहना है कि मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी अनधिकृत रूप से तैयार की गईं और इसकी जांच की जा रही है ।

अटॉर्नी जनरल (AG) के वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि प्रस्तुत दस्तावेज विशेषाधिकार प्राप्त दस्तावेज हैं, जिन्हें भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के अनुसार सबूत नहीं माना जा सकता है। इन दस्तावेजों को आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत संरक्षित किया जाता है। साथ ही एजी ने यह भी कहा कि दस्तावेजों के प्रकटीकरण को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत धारा 8 (1) (ए) के अनुसार छूट दी गई है।

याचिकाकर्ताओं में से एक प्रशांत भूषण ने AG के दावों को गलत बताते हुए कहा कि विशेषाधिकार का दावा उन दस्तावेजों पर नहीं किया जा सकता जो पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 केवल "अप्रकाशित दस्तावेजों" की रक्षा करती है।