निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनाएगा फैसला, जानें अब तक क्या-क्या हुआ…

अदालत ने माना निजता है मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठराइट टू प्राइवेसीको लेकर आज अपना फैसला सुनाएगा. पीठ यह तय करेगी कि निजता मौलिक अधिकार है या नहीं? क्या ये संविधान का हिस्सा है? इस फैसले का असर सीधे-सीधे विभिन्न सरकारी योजनाओं को आधार कार्ड से जोड़ने के मामले पर पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं हैं. कोर्ट ने 7 दिनों की सुनवाई के बाद 2 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

दरअसल 1950 में 8 जजों की बेंच और 1962 में 6 जजों की बेंच ने कहा था कि ‘राइट टू प्राइवेसी’ मौलिक अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ में CJI जेएस खेहर, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस AR बोबडे, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन, जस्टिस अभय मनोगर स्प्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में जजों ने कहा कि अगर मैं अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में हूं तो यह ‘प्राइवेसी’ का हिस्सा है. ऐसे में पुलिस मेरे बैडरूम में नहीं घुस सकती. हालांकि अगर मैं बच्चों को स्कूल भेजता हूं तो ये ‘प्राइवेसी’ के तहत नहीं आता है, क्योंकि यह ‘राइट टू एजूकेशन’ का मामला है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि आप बैंक को अपनी जानकारी देते हैं. मेडिकल इंशोयरेंस और लोन के लिए अपना डाटा देते हैं. यह सब कानून द्वारा संचालित होता है. यहां बात अधिकार की नहीं है.

आज डिजिटल जमाने में डाटा प्रोटेक्शन बड़ा मुद्दा है. सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है. सरकार द्वारा गोपनीयता भंग करना एक बात है, लेकिन उदाहरण के तौर पर टैक्सी एग्रीगेटर द्वारा आपका दिया डाटा आपके ही खिलाफ इस्तेमाल कर ले प्राइसिंग आदि में वो उतना ही खतरनाक है.

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कोर्ट ने कहा, मैं जज के तौर पर बाजार जाता हूं, और आप वकील के तौर पर मॉल जाते हैं. टैक्सी एग्रीगेटर इस सूचना का इस्तेमाल करते हैं. ‘राइट टू प्राइवेसी’ भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है. सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है. राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है.

सरकार को वाजिब प्रतिबंध लगाने से रोका भी नहीं जा सकता है. क्या केंद्र के पास आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म है? विचार करने की बात यह है कि मेरे टेलीफोन या ईमेल को सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ शेयर क्यों किया जाए? मेरे टेलिफोन पर कॉल आती हैं तो विज्ञापन भी आते हैं. तो मेरा मोबाइल नंबर सर्विस प्रोवाइडर्स से क्यों शेयर किया जाना चाहिए. क्या केंद्र सरकार के पास डेटा प्रोटेक्ट करने के लिए ठोस सिस्टम है? सरकार के पास डेटा को संरक्षण करने लिए ठोस मैकेनिज्म होना चाहिए.

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