भ्रष्टाचारियों पर ही क्यों मेहरबान हैं योगी के नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना

सुरेश खन्ना
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के सबसे वरिष्ठ और साफ सुथरी छवि वाले कैबिनेट मंत्री सुरेश खन्ना के विभाग नगर विकास के अंतर्गत आने वाले यूपी जल निगम में भ्रष्टा​चारियों अधिकारियों का बोलबाला है। यूपी जल निगम के एमडी की कुर्सी से सेवानिवृत्त हुए वाईके जैन की बात की जाए तो वह वर्तमान सरकार में दो बार एमडी बनाए गए। उनको पहली बार यह पद मंत्री महोदय की पसंद से दिया गया जबकि दूसरी बार वह अपनी वरिष्ठता के आधार पर…

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के सबसे वरिष्ठ और साफ सुथरी छवि वाले कैबिनेट मंत्री सुरेश खन्ना के विभाग नगर विकास के अंतर्गत आने वाले यूपी जल निगम में भ्रष्टा​चारियों अधिकारियों का बोलबाला है। यूपी जल निगम के एमडी की कुर्सी से सेवानिवृत्त हुए वाईके जैन की बात की जाए तो वह वर्तमान सरकार में दो बार एमडी बनाए गए। उनको पहली बार यह पद मंत्री महोदय की पसंद से दिया गया जबकि दूसरी बार वह अपनी वरिष्ठता के आधार पर एमडी बने। दोनों ही बार जैन के भ्रष्टाचार को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया।

यूपी जल निगम लंबे समय से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का ठिकाना बना हुआ है। पूर्ववर्ती सरकार में हुई 1300 भर्तियों में अनियमितता के बाद एसआईटी जांच की सिफारिश हो चुकी है। तो दूसरी ओर इस विभाग में अहम पदों के लिए विभाग के एक से एक भ्रष्टाचारी अपनी दावेदारी ठोंकते नजर आ रहे हैं।

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सूत्र बताते हैं कि हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जल निगम के एमडी वाईके जैन की कारगुजारी का सबसे बड़ा सुबूत उनसे की गई 10 लाख की विभागीय रिकवरी है जिसे उनके रिटायर्मेन्ट फंड से बसूल किया गया है। 10 लाख की रिकवरी चढ़ें होने के बावजूद जैन को विभाग की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठने का दो बार मौका मिला। अब वह रिटायर हो चुके हैं तो रिटायर्ड एमडी के रूप में वह दो सालों तक बतौर एमडी मिलने वाली तमाम सुविधाओं के हकदार भी रहेंगे क्योंकि यह विभागीय नियम है।

इस बीच खबर आ रही है कि जल निगम में एमडी की कुर्सी के बाद सबसे अहम मानी जाने वाली सीएडंडीएस (जल निगम की निर्माण इकाई) के डायरेक्टर की कुर्सी पर वर्तमान में गोरखपुर में तैनात वरिष्ठ अभियंता आरपी सिन्हा के नाम को आगे बढ़ाया जा रहा है। विभागीय सूत्रों की माने तो सिन्हा के नाम भी 10 लाख से ज्यादा की रिकवरी है। इसके बावजूद उनके नाम को जल निगम के नए एमडी राजेश मित्तल ने आगे कर रखा है।

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इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यूपी सरकार चलाने वाली पार्टी भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात करती है, तो उसी पार्टी के उसूलों को अमल में लाने की जिम्मेदारी उठाने वाले मंत्री भ्रष्टाचार पर आंखें कैसे मूंद लेते है? क्या दशकों तक भ्रष्टाचार करने वाला अधिकारी सरकार बदलने के साथ ईमानदार हो जाता है? या फिर सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार—भ्रष्टाचार चिल्लाने वाले नेताओं को भ्रष्टाचार नजर आना बंद हो जाता है।

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