स्ट्रेचर पर पड़ा रहा महान गणितज्ञ का शव, कुमार विश्वास बोले—उफ़्फ़, इतनी विराट प्रतिभा की ऐसी उपेक्षा…

The body of the great mathematician
स्ट्रेचर पर पड़ा रहा महान गणितज्ञ का शव, कुमार विश्वास बोले—उफ़्फ़, इतनी विराट प्रतिभा की ऐसी उपेक्षा...

पटना। ​बिहार के प्रसिद्ध गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का पटना मेडिकल कॉलेज में आज सुबह निधन हो गया। लेकिन निधन के बाद भी उनके साथ संवेदनहीनता हुई। उनका शव घंटो तक स्ट्रेचर पर पड़ा रहा लेकिन उन्हे एम्बूलेन्स तक न नसीब हो सकी। जब इस संवेदनहीनता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तब जाकर उनका शव ले जाने के लिए एम्बूलेन्स का प्रबन्ध किया गया। वहीं कवि कुमार विश्वास ने इस घटना पर दुख जताते हुए कहा है कि ‘भारत माँ क्यूँ सौंपे ऐसे मेधावी बेटे इस देश को जब हम उन्हें सम्भाल ही न सकें?’

The Body Of The Great Mathematician Lying On The Stretcher Kumar Vishwas Said Oops Such A Great Talent Is Ignored :

 

बताया गया कि 74 वर्षीय वशिष्ठ नारायण सिंह पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे उनका पटना के पीएमसीएच अस्पताल में इलाज चल रहा था। बताया जा रहा है कि आज तड़के उनके मुंह से खून निकलने लगा, जिसके बाद उन्हें तत्काल परिजन पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों का आरोप है कि वशिष्ठ नारायण सिंह की मृत्यु के 2 घंटे तक उनकी लाश अस्पताल के बाहर पड़ी रही, जब सोशल मीडिया पर लोगों ने वीडियो वायरल किया तब 2 घंटे के इंतजार के बाद एबुंलेंस उपलब्ध कराई गई।

हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वशिष्ठ के निधन पर दुख जताया है लेकिन ये बहुत ही शर्मनाक है कि बिहार सरकार उनके पार्थिव शरीर के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था तक नहीं करा पाई। वहीं कुमार विश्वास ने टवीट करते हुए कहा कि उफ़्फ़, इतनी विराट प्रतिभा की ऐसी उपेक्षा? विश्व जिसकी मेधा का लोहा माना उसके प्रति उसी का बिहार इतना पत्थर हो गया? नितीश कुमार, गिरिराज​ सिंह, अश्वनी कुमार चौबे, नित्यानंद राय, आप सबसे सवाल बनता है ! भारतमाँ क्यूँ सौंपे ऐसे मेधावी बेटे इस देश को जब हम उन्हें सम्भाल ही न सकें?।

आपको बता दें कि वशिष्ठ नारायण सिंह मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले थे। उन्होंने गणित से जुड़े कई फॉर्मूलों पर शोध भी किया था। 1965 में उन्हे अमेरिका जाने का मौका मिला और वहीं से 1969 में उन्होंने पीएचडी की थी। वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को भी चुनौती दी थी जिसके लिए पूरी दुनिया में वह प्रसिद्ध हुए थे। बताया जाता है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था। हलांकि पीएचडी पूरी होते ही उन्हे वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी थी लेकिन उनका मन नही लगा तो वो भारत वापस आ गये।

पटना। ​बिहार के प्रसिद्ध गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का पटना मेडिकल कॉलेज में आज सुबह निधन हो गया। लेकिन निधन के बाद भी उनके साथ संवेदनहीनता हुई। उनका शव घंटो तक स्ट्रेचर पर पड़ा रहा लेकिन उन्हे एम्बूलेन्स तक न नसीब हो सकी। जब इस संवेदनहीनता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तब जाकर उनका शव ले जाने के लिए एम्बूलेन्स का प्रबन्ध किया गया। वहीं कवि कुमार विश्वास ने इस घटना पर दुख जताते हुए कहा है कि 'भारत माँ क्यूँ सौंपे ऐसे मेधावी बेटे इस देश को जब हम उन्हें सम्भाल ही न सकें?'   बताया गया कि 74 वर्षीय वशिष्ठ नारायण सिंह पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे उनका पटना के पीएमसीएच अस्पताल में इलाज चल रहा था। बताया जा रहा है कि आज तड़के उनके मुंह से खून निकलने लगा, जिसके बाद उन्हें तत्काल परिजन पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों का आरोप है कि वशिष्ठ नारायण सिंह की मृत्यु के 2 घंटे तक उनकी लाश अस्पताल के बाहर पड़ी रही, जब सोशल मीडिया पर लोगों ने वीडियो वायरल किया तब 2 घंटे के इंतजार के बाद एबुंलेंस उपलब्ध कराई गई। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वशिष्ठ के निधन पर दुख जताया है लेकिन ये बहुत ही शर्मनाक है कि बिहार सरकार उनके पार्थिव शरीर के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था तक नहीं करा पाई। वहीं कुमार विश्वास ने टवीट करते हुए कहा कि उफ़्फ़, इतनी विराट प्रतिभा की ऐसी उपेक्षा? विश्व जिसकी मेधा का लोहा माना उसके प्रति उसी का बिहार इतना पत्थर हो गया? नितीश कुमार, गिरिराज​ सिंह, अश्वनी कुमार चौबे, नित्यानंद राय, आप सबसे सवाल बनता है ! भारतमाँ क्यूँ सौंपे ऐसे मेधावी बेटे इस देश को जब हम उन्हें सम्भाल ही न सकें?। आपको बता दें कि वशिष्ठ नारायण सिंह मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले थे। उन्होंने गणित से जुड़े कई फॉर्मूलों पर शोध भी किया था। 1965 में उन्हे अमेरिका जाने का मौका मिला और वहीं से 1969 में उन्होंने पीएचडी की थी। वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को भी चुनौती दी थी जिसके लिए पूरी दुनिया में वह प्रसिद्ध हुए थे। बताया जाता है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था। हलांकि पीएचडी पूरी होते ही उन्हे वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी मिल गयी थी लेकिन उनका मन नही लगा तो वो भारत वापस आ गये।