महाभारतकाल के बाद पहली बार किन्नरों ने किया अपने पितरों का श्राद्ध

वाराणसी: सदियों से उपेक्षा और तिरस्कार भरी जिंदगी की पीड़ा झेल रहे किन्नर समाज के लिए आज का दिन ऐतिहासिक रहा। शैव पीठ काशी के सुप्रसिद्ध पिशाचमोचन कुंड पर उन्होंने पहली बार अपने पितरों का श्राद्ध किया और खुद को सनातन धर्म से जोड़ने की उद्घोषणा की। इसी के साथ लगभग हजार वर्ष के इतिहास ने फिर करवट ली। इसकी पहल उज्जैन के किन्नर अखाड़ा ने की थी।



किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की अगुवाई में किन्नरों ने काशी विश्वनाथ को अपना ईष्ट मानते हुए शुक्रवार को उनका दर्शन-पूजन किया था। काशीपुराधीश्वरी मां अन्नपूर्णा का भी आशीर्वाद लिया था। सनातन धर्म से जुड़ाव की बेइंतहा खुशी लिए किन्नर पिशाचमोचन कुंड पहुंचे। सुबह तीर्थपुरोहित के निर्देशन में 11 कर्मकांडियों ने उन्हें संकल्प दिलाने के बाद श्राद्ध शुरू करवाया।

महामंडलेश्वर आचार्य लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में 14 किन्नर त्रिपिण्डी श्राद्ध के लिए बैठे। लगभग दो घंटे तक विधि-विधान के साथ उन्होंने त्रिपिंडी श्राद्ध किया। पिंड विसर्जन के बाद किन्नरों ने पुरोहितों को यथायोग्य दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया। उस वक्त उनकी आंखें खुशी से चमक रहीं थीं।

क्या है इतिहास

इतिहास के पन्नो को यदि खंगाला जाए तो मुग़ल काल के बाद आज एक बार फिर इतिहास दोहराया है महाभारत में शिखंडी ने अपने पितरो का श्राद्ध कराया था जिसके बाद आज दोबारा किन्नर समाज के लोगो ने धर्म नगरी काशी में सामूहिक तौर पर धार्मिक रूप से पिंडदान किया है।



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