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सरकार इसलिए पेश करती है बजट, जानें इसका मतलब

The Government Therefore Offers This Budget Know Its Meaning

By पर्दाफाश समूह 
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नई दिल्ली। रक्षा मंत्रालय संभाल चुकीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण मोदी सरकार में वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए पूर्ण बजट पेश कर रहीं है। एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल का ये पहला बजट होगा। लेकिन क्या आपको इस बजट का मतलब पता है अगर नहीं तो इन कुछ बातों को समझ लें जिससे आप निर्मला सीतारमण के भाषण का पूरा मतलब समझ जाएंगे। साथ ही ये बजट क्या है और इससे क्या फायदा होता इस बात की पूरी जानकारी भी जानें।

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बता दें ये बजट एक तरह से सरकार की कमाई होती है, इसलिए जब केंद्र सरकार के पास पैसों की कमी होती है, तो वो बाजार से पैसा जुटाने के लिए Bond जारी करती है। यह एक तरह का कर्ज होता है, जिसकी अदायगी पैसा मिलने बाद सरकार द्वारा एक तय समय के अंदर कर दी जाती है। Bond को कर्ज का सर्टिफिकेट भी कहते हैं।

वहीं, जब सरकार का खर्चा और कमाई दोनों बराबर हो जाता है तो वो राज्य सरकारों व विश्व के अन्य देशों में मौजूद सरकारों द्वारा जो भी वित्तीय लेनदेन होता है, उसे बैलेंस ऑफ पेमेंट के रूप में बनाया जाता है। इस पेमेंट को बजट भाषा में बैलेंस ऑफ पेमेंट कहा जाता है। साथ ही ये भी बता दें कि सरकार चीज़ों पर tax लगाकर अपनी कमाई करती है। ये tax कुछ इस प्रकार होता हैं….

बजट में इन बातों का मतलब ये होगा:

विनिवेश (Disinvestment tax)- इसका मतलब होता है किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी में अपनी हिस्सेदारी को निजी क्षेत्र में बेचना। सरकार द्वारा यह हिस्सेदारी शेयरों के जरिए बेची जाती है। यह हिस्सेदारी किसी एक व्यक्ति या फिर किसी निजी कंपनी को बेची सकते है।

कस्टम ड्यूटी(custom duty tax)- जब किसी दूसरे देश से समुद्र या हवा के रास्ते भारत में सामान उतारा जाता है और उस पर जो Tax लगता है, उसे कस्टम ड्यूटी कहते हैं। इसे सीमा शुल्क (custom duty) भी कहा जाता है।

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एक्साइज ड्यूटी (excise duty tax)- ये tax उन उत्पादों पर लगता है जो देश के भीतर लगते हैं। यह शुल्क उत्पाद के बनने और उसकी खरीद पर लगता है। फिलहाल देश में दो प्रमुख उत्पाद हैं, जिनसे सरकार को सबसे ज्यादा कमाई होती है। पेट्रोल, डीजल और शराब इसके सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। Excise duty को उत्पाद शुल्क भी कहते हैं।

राजकोषीय घाटा (fiscal deficit tax)- सरकार की ओर से लिया जाने वाला अतिरिक्त कर्ज(Additional loan) राजकोषीय घाटा कहलाता है। देखा जाए तो राजकोषीय घाटा घरेलू कर्ज पर बढ़ने वाला अतिरिक्त बोझ ही है। इससे सरकार आय और खर्च के अंतर को दूर करती है।

प्रत्यक्ष कर (Direct tax)- ये tax व्यक्तियों और संगठनों की आमदनी पर लगाया जाता है। चाहे वह आमदनी किसी भी स्रोत से हो। निवेश, वेतन, ब्याज, आयकर, कॉरपोरेट टैक्स आदि प्रत्यक्ष कर (Direct tax) के तहत ही आते हैं।

इनडायरेक्ट टैक्स(Indirect tax)- ग्राहकों द्वारा सामान खरीदने और सेवाओं का इस्तेमाल करने के दौरान उन पर लगाया जाने वाला टैक्स इनडायरेक्ट टैक्स(Indirect tax) कहलाता है। जैसे कि जीएसटी, कस्टम्स ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी आदि इनडायरेक्ट टैक्स के तहत ही आते हैं।

जीडीपी (GDP)- ( Gross Domestic Product) सकल घरेलू उत्पाद यह एक वित्त वर्ष के दौरान देश के भीतर कुल वस्तुओं के उत्पादन और देश में दी जाने वाली सेवाओं का टोटल होता है। जिसके माध्यम से ही आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री सरकारी आमदनी बढ़ाने के विचार से नए करों आदि का प्रस्ताव करते हैं। इसके साथ ही वित्त विधेयक(Finance bill) में मौजूदा कर प्रणाली(tax system) में किसी तरह का संशोधन आदि को प्रस्तावित किया जाता है। संसद की मंजूरी मिलने के बाद ही मौजूदा टैक्स सिस्टम के संशोधन को लागू किया जाता है। यह संशोधन सरकार हर साल बजट पेश करने के दौरान करती है।

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शार्ट टर्म कैपिटल असेट(Short term capital asset)- 36 महीने से कम समय के लिए रखे जाने वाले पूंजीगत संपत्ति(Capital assets) को शार्ट टर्म कैपिटल असेट कहते हैं। वहीं शेयर, सिक्योरिटी और bond आदि के मामले में यह अवधि 36 महीने की बजाय 12 महीने की है।

क्या है पूंजीगत संपत्ति(Capital assets):

पूंजीगत संपत्ति घरों, कारों, निवेश संपत्तियों, स्टॉक, बॉन्ड, और यहां तक कि संग्रहणीय या कला जैसे संपत्ति के महत्वपूर्ण टुकड़े हैं। व्यवसायों के लिए, पूंजीगत संपत्ति एक प्रकार की संपत्ति है जो एक वर्ष से अधिक उपयोगी जीवन के साथ होती है, जिसका उद्देश्य व्यापार के संचालन के नियमित पाठ्यक्रम में बिक्री के लिए नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि एक कंपनी अपने कार्यालय में उपयोग करने के लिए कंप्यूटर खरीदती है, तो कंप्यूटर पूंजीगत संपत्ति है, लेकिन यदि कोई अन्य कंपनी उसी कंप्यूटर को बेचने के लिए खरीदती है, तो इसे सूची माना जाता है।

कैपिटल गेन्स(Capital gains)- पूंजीगत एसेट्स को बेचने या लेन-देने से होने वाला मुनाफा कैपिटल गेन्स कहलाता है।

बता दें कि यह साल एक वित्तीय साल (financial year) है। जो कर निर्धारण वर्ष (assessment year) से ठीक पहले आता है। यह 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च को खत्म होता है। इस दौरान कमाई गई रकम पर कर निर्धारण साल में टैक्स देना होता है। यानी 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 अगर वित्तीय साल है तो कर निर्धारण साल 1 अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2017 तक होगा। फिलहाल सरकार वित्त वर्ष (financial year) को बदलने पर विचार कर रही है।

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