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भारत सरकार का बड़प्‍पन, दर्द देने वाले देशों को दे रहा कोरोना की कारगर दवा

The Greatness Of The Government Of India Giving Effective Medicines Of Corona To The Countries Giving Pain

By टीम पर्दाफाश 
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नई दिल्‍ली: मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर है “दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएं तब शर्मिंदा ना हों”।बशीर बद्र साहब का ये शेर भारत और उन देशों के हालात पर बड़ा सटीक हैं जो कुछ दिन पहले तक भारत का विरोध करते थे। कारण है कि भारत के पास कोरोना से लड़ाई में गेमचेंजर साबित हो रही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन टैबलेट्स बनाने की सबसे ज्‍यादा क्षमता है। इन देशों की लिस्‍ट में ताजा नाम जुड़ा है मलयेशिया का जुड़ गया है। ये वहीं देश है,जिन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और आर्टिकल 370 हटाने का पुरजोर विरोध किया था। अब कोविड-19 से लड़ाई के लिए मलेशिया को भारत के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है। वहीं बड़प्‍पन दिखाकर भारत ने दर्द देने वालों को दवा देने की हामी भर दी है।

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दरअसल पिछले साल भारत ने संविधान के अनुच्‍छेद 370 हटा दिया। मोदी सरकार के इस कदम का कई देशों ने विरोध किया। यूनाइटेड किंगडम उन देशों में से एक था। लेबर पार्टी ने इमर्जेंसी प्रस्‍ताव पास किया कि इंटरनेशनल ऑब्‍जर्वर कश्‍मीर जाएं। भारत ने साफ किया था कि यह उसका घरेलू मामला है। चीन, ईरान, मलयेशिया, टर्की जैसे देशों ने खुले तौर पर इस कदम का विरोध किया। इसके बाद सीएए का विरोध करने वालों में मलयेशिया, टर्की, बांग्‍लादेश जैसे देश शामिल थे। ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी जैसे देशों में प्रदर्शन हुए। गल्‍फ कंट्रीज ने खुले तौर पर कुछ नहीं कहा, मगर दबी जुबान में इस कदम से नाखुशी जाहिर की थी। लेकिन अब समय बदल गया हैं इन दर्द देने वालों को भारत दवा दे रहा है।

भारत ने एचसीक्यू के अलावा पैरासिटामॉल भी इन देशों को सप्‍लाई किया है। एक तरफ जहां भारत दवाओं की सप्‍लाई कर दूसरे देशों की मदद कर रहा है। वहीं, बदले में भारत ने भी कुछ चीजें मांगी हैं। एन 95 मास्‍क, वेंटिलेटर्स,पीपीई सूट्स वगैरह मंगाए जा रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड, साउथ कोरिया, जापान, जर्मनी, सिंगापुर से ये सब चीजें आ रही हैं। देश में कई कंपनियां इस दवा का प्रॉडक्शन करती हैं। जायडस कैडिला और इप्का लैबोरेटरीज प्रमुख हैं। कंपनियां मार्च के लिए मासिक प्रॉडक्शन को 4 गुना कर 40 मीट्रिक टन तक कर सकती हैं। साथ ही अगले महीने 5-6 गुना बढ़ाकर 70 मीट्रिक टन तक किया जा सकता है। अगर ये कंपनियां अपनी फुल कपैसिटी पर काम करें तो हर महीने 200एमजी की 35 करोड़ टैबलेट तैयार की जा सकती हैं।

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