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जन्मदिन विशेष: शास्त्री जी के आदेश पर भारतीय सेना ने लाहौर में फहराया था तिरंगा

By बलराम सिंह 
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The Indian Army Hoisted The Tricolor In Lahore On The Orders Of Shastri

नई दिल्ली। भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज 116वीं जयंती है। उनका जन्म 2 अक्तूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। जब लाल बहादुर शास्त्री महज डेढ़ साल के थे तब उनके पिता का निधन हो गया था। उनका पालन पोषण वाराणसी में उनके एक चाचा के घर हुआ। उनका घर का नाम नन्हे था।
बचपन में शास्त्री जी कई मील पैदल चलकर स्कूल जाते थे। तपती गर्मी में भी वह नंगे पैर ही जाते थे क्योंकि उनके पास जूते नहीं थे।

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आपको यह जानकर हैरत होगी कि बचपन में ही शास्त्री जी पढ़ाई छोड़ कर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। हालांकि बाद में उन्होंने काशी विद्या पीठ में दाखिला लिया। वहां उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि से नवाजा गया। यह उपाधि जीवनभर के लिए उनके नाम का हिस्सा बन गई। वे 9 जून, 1964 को देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे।
1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तब लाल बहादुर शास्त्री ही प्रधानमंत्री थे। उस युद्ध में भारत की जीत में लाल बहादुर शास्त्री के निर्भीक और बुलंद फैसलों ने बड़ी भूमिका निभाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री के निर्देशों का पालन करते हुए भारतीय थल सेना के बहादुर जवानों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ भगाया। आजाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब भारतीय थल सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को न केवल पार किया बल्कि लाहौर पर हमला भी किया।

जब 1962 के युद्ध में भारत चीन से हार गया तो पाकिस्तान को भ्रम हो गया कि भारतीय सेना कमजोर है। इसी सोच के साथ उसने भारत पर हमला कर दिया। उस दौरान लाल बहादुर शास्त्री द्वारा अपनाई गई रणनीति पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए काफी थी।

उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान थे। 1965 की भरी गर्मी थी, जब उन्होंने ऑपरेशन जिब्राल्टर छेड़कर और भारतीय सेना की कम्युनिकेशन लाइन को ध्वसत करने की मंशा से कश्मीर में अपने हजारों सैनिकों को भेजा। उधर भारतीय सेना को दुश्मन फौज के घुसपैठ की सूचना कश्मीरी किसानों और गुज्जर चरवाहों द्वारा दी गई थी।
पर पाकिस्तान पर उलट वार हुआ। ऑपरेशन जिब्राल्टर उन पर उल्टा पड़ गया।

भारतीय सेना ने पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार किया और पाकिस्तान में घुसकर दो तरफा हमला किया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब भारतीय थल सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को न केवल पार किया बल्कि मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में लाहौर पर हमला भी किया। सियालकोट और लाहौर पर हमला करने की रणनीति शास्त्री जी की ही थी। शुरुआत में पाकिस्तान सेना सफल हुई। अयूब ने अपने सिपाहियों को जारी एक बयान में कहा था, ‘आपने अपने दांत दुश्मन की मांस में गड़ा दिए हैं, खूब गहराई से काटा है और उनको खून बहते हुए छोड़ दिया है।’

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उस वक्त अयूब ने एक भारी भूल की। उन्होंने इन्फैंट्री डिविजन लेवल पर कमान में बदलाव का आदेश दिया। वो आदेश था कि जीओसी को बदलकर मेजर जनरल याह्या खान के हाथ में कमान देना। चूंकि बदलाव करने से फोर्स पर असर पड़ा इसलिए एक दिन कोई काम नहीं हुआ। भारतीय जनरल को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिल गया। वैसे तो शास्त्री जी अहिंसा के पुजारी थे लेकिन अपनी मातृभूमि को सबसे ऊपर रखते थे। इसलिए उसकी रक्षा के लिए दुश्मनों को मारना भी मंजूर था।

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