काले बंदर की ‘दैवीय प्रेरणा’ से जज ने सुनाया था रामजन्मभूमि का ताला खुलवाने का फैसला

ram janm bhumi
अयोध्या मामला: मुस्लिम धर्मगुरु इकबाल अंसारी ने रखी शर्त, कहा हम झुनझुना स्वीकार नहीं करेंगे

लखनऊ। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला के हक में निर्णय सुनाया। शीर्ष अदालत ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि 2.77 एकड़ जमीन केंद्र सरकार के अधीन ही रहेगी। इस मौके पर हम बताएंगे उस काले बंदर के बारे में जिसे देखकर अयोध्या ज़िला अदालत के जिला जज ने 1 फ़रवरी 1986 को श्रीराम जन्मभूमि का ताला खुलवाने का फैसला किया था।

The Judge Told The Decision To Open The Lock Of Rams Birthplace With The Divine Inspiration Of The Black Monkey :

जज कृष्णमोहन पांडेय धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। साल 1991 में छपी अपनी आत्मकथा में वह लिखते हैं कि “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बंदर को फल और मूंगफली देते रहे, पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा, मेरे आदेश सुनाने के बाद ही वह वहां से गया। फैसले के बाद जब डीएम और एसएसपी मुझे मेरे घर पहुंचाने गए, तो मैंने उस बंदर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ, मैंने उसे प्रणाम किया, वह कोई दैवीय ताकत थी।

शाम 4.40 बजे सुनाया था फैसला
उस समय बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के कानूनी दावे का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुश्ताक अहमद सिद्दकी ने इस अर्जी पर अदालत से अपनी बात रखने की पेशकश की थी। जज ने कहा, उन्हें सुना जाएगा। लेकिन उन्हें बिना सुने ही उसी शाम 4.40 पर जज फैसला सुना देते हैं। इस फैसले में कहा गया, ‘अपील की इजाजत दी जाती है।

40 मिनट के भीतर खुल गया था ताला
विवादित स्थल पर लगे दो गेटों को प्रशासन ने अपनी सुविधानुसार ओ और पी नाम दे रखा था। कोर्ट ने प्रतिवादियों को गेट संख्या ‘ओ’ और ‘पी’ पर लगे ताले तुरंत खोले जाने का निर्देश दिया था। प्रतिवादी आवेदक और उनके समुदाय को दर्शन और पूजा आदि में कोई अड़चन या बाधा नहीं डालेंगे। इस इमारत में दो गेट थे। जिला प्रशासन ने अपनी सुविधा के लिए उनके नाम ‘ओ’ और ‘पी’ रखे थे। जिला जज के इस फैसले के बाद डीएम और एसएसपी जिला जज को पहुंचाने उनके घर जाते हैं। जज साहब की सुरक्षा बढ़ा दी जाती है। फिर चालीस मिनट के भीतर ही पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ दिया जाता है और अंदर पूजा-पाठ, कीर्तन शुरू हो जाता है.

सारी रात सो नहीं सके याचिकाकर्ता
इसी भक्ति-भावना से अभिभूत हो जज साहब ने ताला खोलने का फैसला लिखा। याचिकाकर्ता उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं उत्तेजना में उस रात वे सो नहीं सके थे। सारी रात उन्होंने जन्मस्थान में कीर्तन करते हुए गुजारा, दूसरे दिन सुबह वे घर जा पाए।

लखनऊ। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला के हक में निर्णय सुनाया। शीर्ष अदालत ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि 2.77 एकड़ जमीन केंद्र सरकार के अधीन ही रहेगी। इस मौके पर हम बताएंगे उस काले बंदर के बारे में जिसे देखकर अयोध्या ज़िला अदालत के जिला जज ने 1 फ़रवरी 1986 को श्रीराम जन्मभूमि का ताला खुलवाने का फैसला किया था। जज कृष्णमोहन पांडेय धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। साल 1991 में छपी अपनी आत्मकथा में वह लिखते हैं कि “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बंदर को फल और मूंगफली देते रहे, पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा, मेरे आदेश सुनाने के बाद ही वह वहां से गया। फैसले के बाद जब डीएम और एसएसपी मुझे मेरे घर पहुंचाने गए, तो मैंने उस बंदर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ, मैंने उसे प्रणाम किया, वह कोई दैवीय ताकत थी। शाम 4.40 बजे सुनाया था फैसला उस समय बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के कानूनी दावे का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुश्ताक अहमद सिद्दकी ने इस अर्जी पर अदालत से अपनी बात रखने की पेशकश की थी। जज ने कहा, उन्हें सुना जाएगा। लेकिन उन्हें बिना सुने ही उसी शाम 4.40 पर जज फैसला सुना देते हैं। इस फैसले में कहा गया, ‘अपील की इजाजत दी जाती है। 40 मिनट के भीतर खुल गया था ताला विवादित स्थल पर लगे दो गेटों को प्रशासन ने अपनी सुविधानुसार ओ और पी नाम दे रखा था। कोर्ट ने प्रतिवादियों को गेट संख्या ‘ओ’ और ‘पी’ पर लगे ताले तुरंत खोले जाने का निर्देश दिया था। प्रतिवादी आवेदक और उनके समुदाय को दर्शन और पूजा आदि में कोई अड़चन या बाधा नहीं डालेंगे। इस इमारत में दो गेट थे। जिला प्रशासन ने अपनी सुविधा के लिए उनके नाम ‘ओ’ और ‘पी’ रखे थे। जिला जज के इस फैसले के बाद डीएम और एसएसपी जिला जज को पहुंचाने उनके घर जाते हैं। जज साहब की सुरक्षा बढ़ा दी जाती है। फिर चालीस मिनट के भीतर ही पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ दिया जाता है और अंदर पूजा-पाठ, कीर्तन शुरू हो जाता है. सारी रात सो नहीं सके याचिकाकर्ता इसी भक्ति-भावना से अभिभूत हो जज साहब ने ताला खोलने का फैसला लिखा। याचिकाकर्ता उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं उत्तेजना में उस रात वे सो नहीं सके थे। सारी रात उन्होंने जन्मस्थान में कीर्तन करते हुए गुजारा, दूसरे दिन सुबह वे घर जा पाए।