किसानों की हालत बताने के लिए ये अकेली तस्वीर काफी है

किसानों की हालत
किसानों की हालत बताने के लिए ये अकेली तस्वीर काफी है

नई दिल्ली। लाल झंडे और लाल टोपी लगाए हजारों किसानों का रैला रविवार की रात में मुंबई पहुंचा, मंत्रालय को घेरकर अपनी मांगे मनवाने के लिए। इस भीड़ में कितने किसान थे और कितने राजनीति से प्रेरित लोग इस बात का आंकलन उसी समय शुरू हो गया था, जब सोशल मीडिया पर भीड़ से भरी सड़कों की तस्वीरें और वीडियो वायरल होना शुरू हुए। किसी ने उन्हें लाल सलाम वाले बामपंथी नेताओं की भड़की भीड़ समझा, तो किसी ने कांग्रेसी नेताओं की फंडिंग पर पलने वाले कथित समाजसेवियों के जरिए पैसे खिलाकर जमा की गई भीड़।

The Only Picture Tells Indian Farmers Story :

झंड़ों और टोपियों के नीचे दबे वे चेहरे नजर नहीं आए जो अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर होने के बावजूद नंगे पांव अपनी आने वाली पीड़ियों के लिए आगे बढ़ रहे थे। नंगे पांव सड़क पर चलने से हुए घावों से निकले खून से लाल हुई सड़क की वो गिट्टियां किसी कैमरे में कैद नहीं हुईं।

ऐसी एक तस्वीर किसानों के मुंबई पहुंचने के बाद सामने आई। जो सोशल मीडिया पर वॉयरल हो रही है। जिसके साथ नाम जोड़ा गया है पूनम महाजन, उम्र 60 साल मालूम होती है और दावा किया जाता है कि वह 180 किलोमीटर पैदल चलकर नासिक से मुंबई पहुंची हैं।

पूनम महाजन की तस्वीर देखने के बाद मुंबई के कुछ नए नवेले डॉक्टरों का दिल पसीज उठा। उन्होंने बिना किसी देरी के कुछ दवाएं लीं और ऐसे लोगों की मलहम पट्टी का काम शुरू कर दिया जिनके पैरों में छाले थे। आज के युग में ऐसी समाजसेवा की उम्मीद तो नहीं की जा सकती लेकिन बुराई कितनी भी बड़ी हो अच्छाई की चमक दबती नहीं है।

खैर वापस आते पूनम महाजन पर, जिनके चेहरे की झुर्रियां बहुत कुछ बयान करतीं हैं। उन झुर्रियों ने दर्द के अहसास के साथ हमारी सरकारों की उन नाकामियों को भी छिपा रखा है, जिनकी वजह से किसान त्रस्त है।

पूनम महाजन की कहानी सुनने की जरूरत नहीं, क्योंकि सब कुछ उस चेहरे पर खिंची लकीरों में लिखा है। कर्ज में दबी जिन्दगी और कल बेहतर होने की उम्मीद में जिन्दा रहने की कोशिश, उन्हें मुंबई तक खींच लाई होगी। अगर अकेली आती तो हम आप जैसे लाखों लोग उन्हें मानसिक रूप से बीमार समझ कर सड़क के किनारे मरने या फिर किसी समाजसेवी संस्था की नजर पड़ने की उम्मीद में दो चार रुपए हाथ पर रखकर, बेचारी के परिवार को कोसते हुए आगे बढ़ जाते।

यहां कहानी बिलकुल अलग है। सरकारी योजनाएं पूनम के दरवाजे तक नहीं पहुंच रहीं हैं। उसके पैरों में चप्पल तक नहीं है, इसका अर्थ इस बात से नहीं निकाला जाना चाहिए कि उसके घर पर शौचालय नहीं है। शौचालय तो होगा, लेकिन तन ढ़ंकने के लिए दो जोड़ी अदद ऐसे कपड़े नहीं होंगे जिन्हें कपड़ा कहा जा सके। सरकार ने बैंक का खाता भी खुलवाया होगा, और उसका नाम भी लाभार्थियों की लिस्ट में कहीं दर्ज होगा। इस बात की फिक्र किए बिना कि जो पूनम महाजन चप्पलों के लिए 30 रूपए नहीं जोड़ पाई वह जनधन खाते में क्या जमा करवाएगी? उसके पास बचत के रूप में केवल हिम्मत बची है, जिसके सहारे वह बदलाव की उम्मीद के साथ अपनी जिन्दगी के दिन गुजार रही है।

पूनम महाजन, 70 साल के उस जवान आजाद देश की तस्वीर है, जो कहने को कृषि प्रधान है, जिसकी 70 फीसदी आबादी गांवों में बसती है और अर्थव्यवस्था का अंदाजा मानसून से लगाया जाता है। विडंबना देखिए कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्या की दर कृषि विकास दर को पीछे छोड़ गई है।

मलाल इस बात का है कि इस युवा देश की सरकार अपनी जनता की खुशहाली जीडीपी में तौली रही है। कृषि प्रधान देश किसानों के विकास को किनारे कर कल कारखानों और कारोबारियों को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटा है।उनकी सहूलियतें बढ़ाने के लिए नीतियों का खाका खींचा जा रहा है जिनका असर 30 फीसदी आबादी पर है। 70 फीसदी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या से ही जूझ रही है।

नई दिल्ली। लाल झंडे और लाल टोपी लगाए हजारों किसानों का रैला रविवार की रात में मुंबई पहुंचा, मंत्रालय को घेरकर अपनी मांगे मनवाने के लिए। इस भीड़ में कितने किसान थे और कितने राजनीति से प्रेरित लोग इस बात का आंकलन उसी समय शुरू हो गया था, जब सोशल मीडिया पर भीड़ से भरी सड़कों की तस्वीरें और वीडियो वायरल होना शुरू हुए। किसी ने उन्हें लाल सलाम वाले बामपंथी नेताओं की भड़की भीड़ समझा, तो किसी ने कांग्रेसी नेताओं की फंडिंग पर पलने वाले कथित समाजसेवियों के जरिए पैसे खिलाकर जमा की गई भीड़।झंड़ों और टोपियों के नीचे दबे वे चेहरे नजर नहीं आए जो अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर होने के बावजूद नंगे पांव अपनी आने वाली पीड़ियों के लिए आगे बढ़ रहे थे। नंगे पांव सड़क पर चलने से हुए घावों से निकले खून से लाल हुई सड़क की वो गिट्टियां किसी कैमरे में कैद नहीं हुईं।ऐसी एक तस्वीर किसानों के मुंबई पहुंचने के बाद सामने आई। जो सोशल मीडिया पर वॉयरल हो रही है। जिसके साथ नाम जोड़ा गया है पूनम महाजन, उम्र 60 साल मालूम होती है और दावा किया जाता है कि वह 180 किलोमीटर पैदल चलकर नासिक से मुंबई पहुंची हैं।पूनम महाजन की तस्वीर देखने के बाद मुंबई के कुछ नए नवेले डॉक्टरों का दिल पसीज उठा। उन्होंने बिना किसी देरी के कुछ दवाएं लीं और ऐसे लोगों की मलहम पट्टी का काम शुरू कर दिया जिनके पैरों में छाले थे। आज के युग में ऐसी समाजसेवा की उम्मीद तो नहीं की जा सकती लेकिन बुराई कितनी भी बड़ी हो अच्छाई की चमक दबती नहीं है।खैर वापस आते पूनम महाजन पर, जिनके चेहरे की झुर्रियां बहुत कुछ बयान करतीं हैं। उन झुर्रियों ने दर्द के अहसास के साथ हमारी सरकारों की उन नाकामियों को भी छिपा रखा है, जिनकी वजह से किसान त्रस्त है।पूनम महाजन की कहानी सुनने की जरूरत नहीं, क्योंकि सब कुछ उस चेहरे पर खिंची लकीरों में लिखा है। कर्ज में दबी जिन्दगी और कल बेहतर होने की उम्मीद में जिन्दा रहने की कोशिश, उन्हें मुंबई तक खींच लाई होगी। अगर अकेली आती तो हम आप जैसे लाखों लोग उन्हें मानसिक रूप से बीमार समझ कर सड़क के किनारे मरने या फिर किसी समाजसेवी संस्था की नजर पड़ने की उम्मीद में दो चार रुपए हाथ पर रखकर, बेचारी के परिवार को कोसते हुए आगे बढ़ जाते।यहां कहानी बिलकुल अलग है। सरकारी योजनाएं पूनम के दरवाजे तक नहीं पहुंच रहीं हैं। उसके पैरों में चप्पल तक नहीं है, इसका अर्थ इस बात से नहीं निकाला जाना चाहिए कि उसके घर पर शौचालय नहीं है। शौचालय तो होगा, लेकिन तन ढ़ंकने के लिए दो जोड़ी अदद ऐसे कपड़े नहीं होंगे जिन्हें कपड़ा कहा जा सके। सरकार ने बैंक का खाता भी खुलवाया होगा, और उसका नाम भी लाभार्थियों की लिस्ट में कहीं दर्ज होगा। इस बात की फिक्र किए बिना कि जो पूनम महाजन चप्पलों के लिए 30 रूपए नहीं जोड़ पाई वह जनधन खाते में क्या जमा करवाएगी? उसके पास बचत के रूप में केवल हिम्मत बची है, जिसके सहारे वह बदलाव की उम्मीद के साथ अपनी जिन्दगी के दिन गुजार रही है। पूनम महाजन, 70 साल के उस जवान आजाद देश की तस्वीर है, जो कहने को कृषि प्रधान है, जिसकी 70 फीसदी आबादी गांवों में बसती है और अर्थव्यवस्था का अंदाजा मानसून से लगाया जाता है। विडंबना देखिए कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्या की दर कृषि विकास दर को पीछे छोड़ गई है।मलाल इस बात का है कि इस युवा देश की सरकार अपनी जनता की खुशहाली जीडीपी में तौली रही है। कृषि प्रधान देश किसानों के विकास को किनारे कर कल कारखानों और कारोबारियों को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटा है।उनकी सहूलियतें बढ़ाने के लिए नीतियों का खाका खींचा जा रहा है जिनका असर 30 फीसदी आबादी पर है। 70 फीसदी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या से ही जूझ रही है।